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    <title>Tushar Pandey</title>
    <link>https://tusharpandey.in</link>
    <description>Stories, Poetry and Essays by Tushar Pandey</description>
    <language>hi</language>
    <managingEditor>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</managingEditor>
    <lastBuildDate>Thu, 01 May 2026 00:00:00 +0530</lastBuildDate>
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      <title>Tushar Pandey</title>
      <link>https://tusharpandey.in</link>
    </image>
    <item>
      <title>The Quiet Cost of Ambition</title>
      <link>https://tusharpandey.in/ideas/the-quiet-cost-of-ambition</link>
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      <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>Essay</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>There is a particular kind of exhaustion that does not show up on your face. It lives somewhere behind the eyes — in the gap between the person you are at your desk at eight in the morning and the person you wish to become by the time the city goes quiet at night.</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>There is a particular kind of exhaustion that does not show up on your face. It lives somewhere behind the eyes — in the gap between the person you are at your desk at eight in the morning and the person you wish to become by the time the city goes quiet at night.</p>

    
    <img
         src="https://images.unsplash.com/photo-1486312338219-ce68d2c6f44d?w=900&q=80"
         alt="A person writing at a desk by a window — the quiet space where ambition lives"
        />
    <p>The desk at eight in the morning.</p>
    
    <p>I have been thinking about ambition lately. Not the loud, chest-thumping kind that fills motivational seminars, but the quieter sort that sits with you on the morning commute, that makes you open a notebook at midnight when you should be sleeping, that turns ordinary Sundays into small negotiations with the future.</p>
    <p>Most people I know carry two lives simultaneously. The life they are living — the job, the routine, the practical necessities — and the life they are building toward. The distance between the two is not always painful. Sometimes it is simply the natural architecture of becoming. But sometimes the gap is wide enough to feel like a fault line.</p>
    <p>What strikes me is how rarely we speak about this honestly. We talk about goals and timelines and productivity systems. We rarely talk about the specific loneliness of wanting more than your current circumstances allow, or the strange guilt that comes with ambition in a culture that also prizes contentment.</p>
    <p>Perhaps the most honest thing one can say is this: ambition is neither virtue nor vice. It is simply energy. What matters is where you aim it, and whether you are kind to yourself on the long days when the aim seems to miss.</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#52 तुम लौट आओ</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-52</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-52</guid>
      <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>कविता</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>चैत की इस प्रखर दुपहरी मेंन जाने क्योंधरती का कलेजाधधक उठा है;आग की लपटेंहवाओं के कंधों पर सवार,अट्टहास कर रही हैंसबकुछ भस्म कर देने को।डर है... ये निष्ठुर लपटेंकहीं तुम्हारी स्मृतियों केकोमल शिलालेख न पिघला दें,और छोड़ जाएंमेरे अंतर्मन को एक बंजर मरुस्थल।तुम लौट आओ,बनकर तुषार की</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>चैत की इस प्रखर दुपहरी में<br>न जाने क्यों<br>धरती का कलेजा<br>धधक उठा है;<br>आग की लपटें<br>हवाओं के कंधों पर सवार,<br>अट्टहास कर रही हैं<br>सबकुछ भस्म कर देने को।</p><p>डर है... ये निष्ठुर लपटें<br>कहीं तुम्हारी स्मृतियों के<br>कोमल शिलालेख न पिघला दें,<br>और छोड़ जाएं<br>मेरे अंतर्मन को एक बंजर मरुस्थल।</p><p>तुम लौट आओ,<br>बनकर तुषार की एक ठंडी रात,<br>और इतना बरसो<br>कि यादों पर बर्फीली परतें<br>सदा को जम जाएं।<br>अब लौट आओ...<br>इन झुलसती तनहाइयों से<br>अब डर लगने लगा है।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#51 प्रेम सुधा साँचा रस है</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-51</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-51</guid>
      <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>कविता</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>स्वार्थ, द्वेष की फांस लिए,
सब का, अपना ढेरा है।
चाहे बंधु, सखा, कुल छूटे,
कहते, ये मेरा, वो तेरा है!

फिर शुष्क पड़े कुछ आंखों के,
आतप जलते हतभागों के,
हित कौन भला अम्बर होगा?
क्या उनका भी ईश्वर होगा?

क्या प्रेम, दया, करुणा, दुलार,
ऐसों के हिस्से आयेगा?
सूने बंजर पाषाणों पर,
उप</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>स्वार्थ, द्वेष की फांस लिए,<br>
सब का, अपना ढेरा है।<br>
चाहे बंधु, सखा, कुल छूटे,<br>
कहते, ये मेरा, वो तेरा है!<br>
<br>
फिर शुष्क पड़े कुछ आंखों के,<br>
आतप जलते हतभागों के,<br>
हित कौन भला अम्बर होगा?<br>
क्या उनका भी ईश्वर होगा?<br>
<br>
क्या प्रेम, दया, करुणा, दुलार,<br>
ऐसों के हिस्से आयेगा?<br>
सूने बंजर पाषाणों पर,<br>
उपवन भला क्या खिल पाएगा?<br>
<br>
अब भी समय ठहर जा प्यारे!<br>
सुन अतीत क्या कहता है,<br>
लोभ-हवस से जन्मा वैभव,<br>
निश्चित है! मिटता, ढहता है।<br>
<br>
एक प्राण है, एक धरा है,<br>
जीवन उत्सव ख़ूब भरा है,<br>
चहुंओर दिखे जो, वह तुम ही हो,<br>
तुमसे पृथक, कुछ नहीं खड़ा है।<br>
<br>
द्वेष अग्नि, है लोभ रोग,<br>
और स्वार्थ मृत्यु की छाया है।<br>
बंधु, सखा, अपनों से फेर मुख,<br>
भला सुखी कोई रह पाया है।<br>
<br>
धन, पद, मोह, दरप त्यागो तुम,<br>
प्रेमी अँखियन गर जागो तुम,<br>
भगवन् भी तत्क्षण मिल जाएंगे,<br>
अंक खोल यदि मांगो तुम।<br>
<br>
शाश्वत शब्द तुषार के,<br>
करुणा का स्वाद अनूठा है।<br>
प्रेम सुधा साँचा रस है,<br>
बाकी सब कुछ झूठा है।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#50 इश्क़ में होना</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-50</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-50</guid>
      <pubDate>Sun, 05 Apr 2026 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>कविता</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>इश्क़ में होना,
सैंकड़ों इंद्रधनुषों से,
लबालब भर जाना होता है।
और होता है, आंखों में,
चांद लिए इतने हौले देखना,
कि नजर ना चुभे कहीं।
केवल पसरता रहे —
ऊपर-ऊपर।

इश्क़ में होना,
पंछी बन जाना होता है।
किसी छोटी गौरेया की पंखों
की लय सुनते ही,
हवाओं से हल्का हो,
सुदूर क्षितिज तक,
सैर</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>इश्क़ में होना,<br>
सैंकड़ों इंद्रधनुषों से,<br>
लबालब भर जाना होता है।<br>
और होता है, आंखों में,<br>
चांद लिए इतने हौले देखना,<br>
कि नजर ना चुभे कहीं।<br>
केवल पसरता रहे —<br>
ऊपर-ऊपर।<br>
<br>
इश्क़ में होना,<br>
पंछी बन जाना होता है।<br>
किसी छोटी गौरेया की पंखों<br>
की लय सुनते ही,<br>
हवाओं से हल्का हो,<br>
सुदूर क्षितिज तक,<br>
सैर करना होता है।<br>
<br>
इश्क़ में होना,<br>
मां हो जाना होता है।<br>
शिशु हो जाना होता है।<br>
खिलखिलाना होता है।<br>
आंसू बहाना होता है।<br>
मूरख हो जाना होता है।<br>
<br>
इश्क़ में होना,<br>
गुलाब की पंखुड़ी हो जाना होता है।<br>
गेहूं की झूमती हुई बाली हो जाना होता है।<br>
नदी हो जाना होता है।<br>
पहाड़ से सरकता, खनकता हुआ,<br>
छोटा पत्थर होना होता है। <br>
<br>
इश्क़ में होना,<br>
सूक्ष्म हो जाना होता है।<br>
सबमें शामिल होना होता है,<br>
ईश्वर बन जाना होना होता है,<br>
और घुप्प अंधेरी रातों में,<br>
सिर झुकाए, उनींदे,<br>
फ़रियादी होना होता है।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#49 ईप्सा</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-49</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-49</guid>
      <pubDate>Sun, 15 Mar 2026 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>विप्लव गान</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>दुनियावी ढोल मंजीरों के बीच,
ओझल होतीं मेरी रवहीन सांसे।
उचकता, उछलता और नाचता
मैं — बेसुरा,
एक अदना आदम।

गीत बुनने की ईप्सा में,
थकता-बुझता,
कई जन्मों से षड्यंत्र रचता, मैं 
अब चीख उठूंगा सप्तक स्वर में,
तमाम हदों से ऊपर।
पंछियों से कह दो, चुप सो जाएं,
और नदियां सिल लें अपने हो</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>दुनियावी ढोल मंजीरों के बीच,<br>
ओझल होतीं मेरी रवहीन सांसे।<br>
उचकता, उछलता और नाचता<br>
मैं — बेसुरा,<br>
एक अदना आदम।<br>
<br>
गीत बुनने की ईप्सा में,<br>
थकता-बुझता,<br>
कई जन्मों से षड्यंत्र रचता, मैं <br>
अब चीख उठूंगा सप्तक स्वर में,<br>
तमाम हदों से ऊपर।<br>
पंछियों से कह दो, चुप सो जाएं,<br>
और नदियां सिल लें अपने होंठ,<br>
शुरू हो रहा —<br>
विप्लव गान।<br>
<br>
इंसानी<br>
बा-इख़्तियार मालपुओं<br>
की चुभती मिठास। <br>
इनसे पेट तो भर जाता,<br>
पर जी नहीं भरता।<br>
<br>
क्षितिज से दौड़ती आती,<br>
ये सौंधी हवा, धौंकती मेरी जठराग्नि;<br>
कहीं वो डूबता सूरज निगल न जाऊं,<br>
फ़िर चांद मिठाई काट खाऊं —<br>
कुतर-कुतर।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#48 तोहरे बिना सब सून</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-48</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-48</guid>
      <pubDate>Wed, 04 Mar 2026 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>पूरबी विरह गीत</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>सजना...तोहरे बिना सब सून
सजना...तोहरे बिना सब सून
तोहरे बिना सब सून

चंदा मोरा, बदन जलाए
चंदा मोरा, बदन जलाए
तुम बिन तरसे मोरा जिया
सजना...तोहरे बिना सब सून
सजना...तोहरे बिना सब सून
तोहरे बिना सब सून

कोयलिया, टीस जगाए
पुरवइया, पीर बढ़ाए
उन बिन कहीं ना सुकून
सजना...तोहरे बिना सब</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>सजना...तोहरे बिना सब सून<br>
सजना...तोहरे बिना सब सून<br>
तोहरे बिना सब सून<br>
<br>
चंदा मोरा, बदन जलाए<br>
चंदा मोरा, बदन जलाए<br>
तुम बिन तरसे मोरा जिया<br>
सजना...तोहरे बिना सब सून<br>
सजना...तोहरे बिना सब सून<br>
तोहरे बिना सब सून<br>
<br>
कोयलिया, टीस जगाए<br>
पुरवइया, पीर बढ़ाए<br>
उन बिन कहीं ना सुकून<br>
सजना...तोहरे बिना सब सून<br>
सजना...तोहरे बिना सब सून<br>
तोहरे बिना सब सून<br>
<br>
जुलमी बालम, बहुत सताए <br>
प्यासी अंखियां, बरस न जाएं<br>
दरस दिखाओ, मोरा पिया<br>
सजना...तोहरे बिना सब सून<br>
सजना...तोहरे बिना सब सून<br>
तोहरे बिना सब सून</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#47 पूस मास बीति गयउ बाग बन जागि उठें</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-47</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-47</guid>
      <pubDate>Thu, 19 Feb 2026 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>भक्ति-श्रृंगार मिश्रित रीति काव्य</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>पूस मास बीति गयउ बाग बन जागि उठें,
काकलीख बांचहिं बैठि बात आपन चीति की।
मीठि बयरिया में सुलगै अँकोरि मोरि,
निष्ठुर बसंत आयउ कहुँ टोह नहिं मीत की।
देब दनुज सर्प भूत अदभुत बरात साजि,
भोला गौरीनाथ भए देखि बिधि रीति की।
सोभा रितुराज मानि नंदलाल रचे रास इहाँ,
प्रेमिन के हिय जानि केलि</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>पूस मास बीति गयउ बाग बन जागि उठें,<br>
काकलीख बांचहिं बैठि बात आपन चीति की।<br>
मीठि बयरिया में सुलगै अँकोरि मोरि,<br>
निष्ठुर बसंत आयउ कहुँ टोह नहिं मीत की।<br>
देब दनुज सर्प भूत अदभुत बरात साजि,<br>
भोला गौरीनाथ भए देखि बिधि रीति की।<br>
सोभा रितुराज मानि नंदलाल रचे रास इहाँ,<br>
प्रेमिन के हिय जानि केलि कुंज प्रीति की।<br>
कहत तुषारकबि छोड़ि सब राग फाँस,<br>
ध्यान धरि मगन रहु छबि रघुबर गुनातीत की।</p><hr><p></p><p></p><p></p><p></p><p></p><p></p><p><strong>English Translation </strong></p><p><em>पूस मास बीति गयउ बाग बन जागि उठें,<br>
काकलीख बांचहिं बैठि बात आपन चीति की।</em></p><p>The month of Paush (mid-winter) has passed, and the gardens and forests are waking up. Sitting amidst the greenery, the birds (Koel) are chirping (singing), reading out the hidden secrets of their hearts.</p><p>***</p><p><em>मीठि बयरिया में सुलगै अँकोरि मोरि,<br>
निष्ठुर बसंत आयउ कहुँ टोह नहिं मीत की।</em></p><p>In this sweet, gentle breeze, a fire of longing smolders within me. This "cruel" Spring has arrived, yet there is still no sign or trace of my beloved.</p><p>***</p><p><em>देब दनुज सर्प भूत अदभुत बरात साजि,<br>
भोला गौरीनाथ भए देखि बिधि रीति की</em>।</p><p>With gods, demons, serpents, and ghosts joining a wondrous wedding procession, the ascetic Lord Shiva became the husband of Gauri (Parvati), following the sacred traditions of destiny.</p><p>***</p><p><em>सोभा रितुराज मानि नंदलाल रचे रास इहाँ,<br>
प्रेमिन के हिय जानि केलि कुंज प्रीति की।</em></p><p>Honoring the beauty of Spring (the King of Seasons), Krishna (Nandlal) performs the Raas dance in the hearts of his devotees just like he does in Keli Kunj with Gopis and Radhaji.</p><p>***</p><p><em>कहत तुषारकबि छोड़ि सब राग फाँस,<br>
ध्यान धरि मगन रहु छबि रघुबर गुनातीत की।</em></p><p>The poet Tushar says: Leave behind the traps of worldly attachments. Instead, stay immersed in meditation on the divine beauty of Lord Rama (Raghubar), who is beyond all worldly qualities.</p><p>🪷</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#46 अधूरा लिखूंगा</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-46</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-46</guid>
      <pubDate>Mon, 02 Feb 2026 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>मुक्तक</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>लिखने चलूं गर तुम्हारा ये चेहरा
पहले कहूंगा कि सुंदर है चेहरा
फ़िर थोड़ी और कोशिश करूं
तो लिखूंगा कि कैसे तुम्हारी एक नज़र 
मुझे छू जाती है—ऐसे
जैसे किसी नज़र ने न छुआ हो अब तक 

इतना बोल शायद मै थोड़ी देर चुप बैठूं 
ये सोचते कि कहीं कुछ ज़्यादा न कह दिया हो
कहीं मेरी ही नज़र न ल</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>लिखने चलूं गर तुम्हारा ये चेहरा<br>
पहले कहूंगा कि सुंदर है चेहरा<br>
फ़िर थोड़ी और कोशिश करूं<br>
तो लिखूंगा कि कैसे तुम्हारी एक नज़र <br>
मुझे छू जाती है—ऐसे<br>
जैसे किसी नज़र ने न छुआ हो अब तक <br>
<br>
इतना बोल शायद मै थोड़ी देर चुप बैठूं <br>
ये सोचते कि कहीं कुछ ज़्यादा न कह दिया हो<br>
कहीं मेरी ही नज़र न लग जाए मेरी खुशियों पर<br>
फिर एक टक निहारते—मन में<br>
बसी तुम्हारी तस्वीर टटोलूंगा आदतन, <br>
और गर मिल गई नज़रें तो <br>
ठिठककर आँखें मूंद लूंगा<br>
<br>
सोचूंगा कि क्या इस बार भी मेरा प्रेम <br>
अधूरा रह जाएगा हर बार की तरह<br>
क्या दम तोड़ देगा—आंसू बनकर<br>
जिनकी तीखी बारिशों से <br>
लकीरें बन आईं हैं मेरे चेहरे पर<br>
मुस्कुराऊं तो छिप जाती जो<br>
<br>
***<br>
<br>
फिर शायद लिखूं मैं एक सुंदर कहानी<br>
छोटा था बच्चा, और बूढ़ी थी नानी<br>
धमाचौकड़ी करती हुईं सैंकड़ों स्मृतियां<br>
लड़ उठेंगी पसरने के लिए पन्नों पर<br>
<br>
कहानी में जीऊंगा एक बार फ़िर —खुद को <br>
इतवार की दुपहरी चुप चुपके खिड़की से<br>
<em>शक्तिमान</em> देखता, मेरा मन भी उड़ जाएगा <br>
थोड़ी देर <br>
फिर <em>नॉस्टेलजिया</em> के वज़न से गिर जाऊंगा<br>
धड़ाम — खुशियों के साथ खुद से बिछड़ने का<br>
ग़म भी आ बैठता है कल्पनाओं पर, अमूमन<br>
<br>
***<br>
<br>
धूल झाड़ मै जिद्दी कलम का सिपाही<br>
अब थोड़ी और चौड़ी मुस्कान लिए<br>
शायद लिखूं पर्वत, नदियां<br>
उपवन, सूरज, ईश्वर, पंछी, हवाएं<br>
थोड़ी और कोशिश करूं तो शायद<br>
बखान कर दूं — <br>
परमात्मा  देख लेने का अनुभव भी<br>
ऐसा अनोखा अनुभव <br>
कि आह भर उठें कितने सारे।<br>
<br>
***<br>
इतना कुछ कहने, लिखने बोलने के<br>
बावजूद बच जाएगा, बहुत सारा<br>
जो कहना चाहूंगा वो अनकहा रह जाएगा<br>
भटकते रहूंगा— इर्द गिर्द<br>
<br>
मैं, एक अधूरा रचनाकार<br>
सीमित अस्तित्व लिए<br>
हाय!<br>
कैसे समेटूंगा ये असीम विस्तार <br>
असल नहीं लिख पाऊंगा मैं<br>
जाहिर है—<br>
सिर्फ परछाई ही लिख पाऊंगा।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#45 कीमत</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-45</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-45</guid>
      <pubDate>Sat, 27 Dec 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>freeverse</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>इस दुनिया में लाखों दिमाग़ है,
हजारों मुंह है, सैकड़ों कलम है,
जो निरंतर सोचते, बोलते और
चीखते रहते हैं।

कितना भी मोम डाल लूं कानों में,
पुतलियों पर कालिख पोत लूं,
मैं फ़िर भी देख सुन लेता हूं — 
बहुत सारा।

बेरोक टोक, घुसे चले आते हुए,
ये हठीले कबीले, और उनके विचार
चबाते जाते ह</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>इस दुनिया में लाखों दिमाग़ है,<br>
हजारों मुंह है, सैकड़ों कलम है,<br>
जो निरंतर सोचते, बोलते और<br>
चीखते रहते हैं।<br>
<br>
कितना भी मोम डाल लूं कानों में,<br>
पुतलियों पर कालिख पोत लूं,<br>
मैं फ़िर भी देख सुन लेता हूं — <br>
बहुत सारा।<br>
<br>
बेरोक टोक, घुसे चले आते हुए,<br>
ये हठीले कबीले, और उनके विचार<br>
चबाते जाते हैं मेरी हस्ती,<br>
मुझे एकरंगा बनाने का स्वप्न लिए।<br>
<br>
किंकर्तव्यविमूढ़ मैं,<br>
हर क्षण रिहाई के लिए लड़ता हुआ,<br>
अक्सर मजबूर नज़र आता हूं।<br>
आज़ाद होने की जितनी ज़्यादा कोशिश करता हूं<br>
उतना ज्यादा बिखरता जाता हूं।<br>
<br>
इन तमाम संघर्षों के बावजूद<br>
मुझे भीड़ का होना नहीं पसंद।<br>
ख़ुद के खुद का बने रहने के लिए<br>
चुकाई जाती हर एक कीमत—<br>
मंजूर है।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#44 पाप</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-44</link>
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      <pubDate>Fri, 19 Dec 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>संस्मरण</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>साल का ये वह दौर था जब सर्दियां एक हठीले माशूक़ की तरह छोड़ जाने को तैयार ही नहीं हो रही थी। ठंड के कपड़े सूरज के निकलते ही कांटो की तरह बदन को चुभने लगते थे।फरवरी के उन आखिरी दिनों में कोहरे की चादरें दिन प्रतिदिन हल्की होने लगी थीं और उनके दूसरी तरफ क्षितिज से तेज आती चटख पीली</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>साल का ये वह दौर था जब सर्दियां एक हठीले माशूक़ की तरह छोड़ जाने को तैयार ही नहीं हो रही थी। ठंड के कपड़े सूरज के निकलते ही कांटो की तरह बदन को चुभने लगते थे।</p><p>फरवरी के उन आखिरी दिनों में कोहरे की चादरें दिन प्रतिदिन हल्की होने लगी थीं और उनके दूसरी तरफ क्षितिज से तेज आती चटख पीली रंगत सबको एकटक निहारने को मजबूर कर देती। ये सुंदर रंग गेहूं के फसल के साथ चहुंओर लगाए गए सरसों के पौधों की थी।</p><p>गांव की इकलौती सड़क जिसके किनारे घर बसे हुए थे वहां से थोड़ी दूर पूरब की तरफ़ इकलौता सूरजमुखी का खेत था जिसमें पौधे नैसर्गिक अनुशासन में सिर झुकाए शायद सूरज के उगने का इंतजार कर रहे थे।</p><p>***</p><p>खेत नहीं गोया कोई क्लासरूम हो। समान दूरी पर लंबे खड़े ये आदमकद पौधे सूरज की पहले किरण के साथ ही तनकर खड़े हो जाते, और उसकी दिनमान गति की दिशा में ऐंठते रहते। पर ये बदलाव इतनी शांति से होता कि -- कोई जादुई तिलिस्म मालूम पड़ता था।</p><p>उस दौर में हम बच्चों ने कितनी ही बार सूरजमुखी की सरघुमाई देखने की योजनाएं बनाई थी पर इस बिल्कुल धीमे बदलाव के आगे हमारा धैर्य हमेशा दम तोड़ देता।</p><p>सूरजमुखी के खेत में उसके तेल भरे बीजों की खुश्क महक हवाओं में पसरी हुई होती। फूल के केंद्र में खूबसूरती से सैंकड़ों बीज टंके हुए दिखते थे। कभी कभी तो छूते हीं एक दो हाथ में गिर पड़ते।</p><p>***</p><p>ये कितना अजीब है कि सुख की सारी व्यवस्थाओं के बीच रहकर भी आजकल सुबह जल्दी उठने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता है। पर मिलेनियम के बाद के उन शैशव वर्षों में, सुबह उठ कर बाहर भागने की न जाने कौन सी जल्दबाजी रहती थी। स्कूल जाने से पहले एक लंबा समय होता था जिसमें खेला जा सकता था, उछल कूद की जा सकती थी।</p><p>ऐसे ही एक दिन मैने अपने छोटे भाई को रसोईघर से दबे पांव निकलते देखा, तहकीकात की तो पैंट की जेब से हरे से लाल होती कुछ मिर्चियां निकली। गोल भरे-पूरे चेहरे में थोड़ी धंसी हुई उसकी शैतान आँखें उत्साह से चमक रही थीं।</p><p>***</p><p>थोड़ी देर बाद सड़क पर बच्चों के तेज शोरगुल की आवाजें सुनाई देने के बाद, छत की मुंडेर से देखा तो मेरा छोटा भाई अपने छाती से कुछ दबाए घर की ओर तेजी से दौड़ा चला आ रहा था। उसके पीछे दर्जनों बच्चे धमाचौकड़ी करते सरपट भागे आते आ रहे थे।</p><p>जाकर देखा तो इन हज़रत के हाथ में एक पंछी दिखाई पड़ा। इनकी लहूलुहान उंगलियां एक विचित्र संघर्ष की गाथा बयां कर रहीं थीं। इनके हाथ में एक हल्के हरे रंग का तोता दबा पड़ा था।</p><p>सूरजमुखी के खेत में बीज खाने अक्सर आते हुए सुग्गों को लाल मिर्च से ललचाने और पकड़ लाने की इनकी योजना आखिरकार सफल हो गई थी।</p><p>***</p><p>परिवार में सभी बड़ों को तोते को पालतू बनाने से समस्या थी। मुझे व्यक्तिगत तौर पर कोई दिक्कत नहीं थी क्योंकि मैं ग्यारह बरस का ही था लेकिन चूंकि मैं बड़ा भाई था, इसलिए खुद को शायद बड़ा साबित करने के लिए उसे समझाने लगा कि इस तोते को छोड़ दो।</p><p>सबके बार बार बहलाने फुसलाने के बावजूद वह तोते को छोड़ने के लिए राज़ी नहीं हुआ।</p><p>एक बुजुर्ग इस घटना को बड़े आनन्द के साथ काफ़ी देर से देख रहे थे। मुस्कुराते हुए चलकर आए और तपाक से चौंकते हुए बोल पड़े, “देखो इसकी चोंच पीली है” “इसका मतलब हो सकता है ये तोता नहीं तोती हो। क्योंकि नर तोते की चोंच तो लाल होती है।</p><p>हम सब बच्चे ये नया नाम सुन कर एक दूसरे का मुंह देखने लगे और फुसफुसाने लगे, “तोती!”</p><p>“हां! तोती। ये पंछी नर नहीं मादा है। और इसके छोटे छोटे बच्चे भी होंगे। अगर इसे कैद रखोगे तो बहुत पाप लगेगा।”</p><p>पाप की बात सुनकर सबने भयभीत चेहरे लिए मेरे भाई की ओर देखा। अभी थोड़ी ही देर पहले पालतू तोता रखने की ज़िद करता हुआ वो खूब रोया था। लेकिन अगले ही पल पाप के डर से वह पंछी को छोड़ने के लिए राज़ी भी हो गया।</p><p>छोड़े जाने के बाद नीचे लगभग लुढ़कते हुए तोते ने पहले तो उड़ने के लिए थोड़ी कश्मकश की फ़िर कुछ प्रयासों के बाद उड़ने में सफल रहा।</p><p>सूरजमुखी के खेत की ओर उड़ते हुए जा रहे उस तोते ने भी शायद चैन की सांस ली होगी। सूरज अब पूरी तरह निकल आया था। तेज कौंधती रोशनी में तोते की चोंच सुर्ख लाल नज़र आ रही थी।</p><p>(समाप्त)</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#43 अजीब दास्तां है ये</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-43</link>
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      <pubDate>Sat, 13 Dec 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>Uncategorised</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>मौत का भी इलाज हो शायद
ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं
           - फ़िराक़ गोरखपुरी एक समय जब मेरे सारे मित्र और परिवार के लोग, गुलाबी ठंड का बहुआयामी तरीकों से मजे लेते हुए भी कॉल पर सर्दियों की वजह से अपना परेशानियां गिनाते नहीं थकते जिससे कि मुझे अपने पसंदीदा मौसम खोने का ज्यादा ग़म</description>
      <content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>मौत का भी इलाज हो शायद<br>
ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं<br>
           - फ़िराक़ गोरखपुरी </p></blockquote><p>एक समय जब मेरे सारे मित्र और परिवार के लोग, गुलाबी ठंड का बहुआयामी तरीकों से मजे लेते हुए भी कॉल पर सर्दियों की वजह से अपना परेशानियां गिनाते नहीं थकते जिससे कि मुझे अपने पसंदीदा मौसम खोने का ज्यादा ग़म न हो, ऐसे में मुंबई का कन्फ्यूज्ड मौसम मेरी दिमाग़ी हालत की रोज़ परीक्षा ले रहा है।</p><p>दो चार शामों से मन बहुत थका हुआ रहता है, ट्रेन की खिड़की से दिखते शाम के सूरज को धीरे धीरे क्षितिज पर पिघलते हुए देखकर भी अब दिल नहीं भरता। मुझे याद है विद्यार्थी जीवन में ऐसे पलों को देख मैं फूले नहीं समाता था। आजकल जैसे में मुझे सिर्फ तीन चीजें ही याद रह गईं हैं:- भूख, थकान और नींद।</p><p>***</p><p>इन्हीं दिनों मेरा मन चलते-फिरते, उठते-जागते ये विश्लेषण करने में व्यस्त रहता है कि क्या मैं नितांत दुःखी हूं? पर इसे स्वीकारते ही वही मन मुझे बालकनी में दिन रात सोते हुए बिल्ली को छेड़ने के लिए प्रेरित करता है। अभी परसों की बात है, मुझे ऐसा लगा कि बिल्ली के सिर पर आहिस्ता हाथ फेरने से उसे अच्छा लगेगा। और एक सच ये भी है कि मैं दिन रात अकेले रहके इस अनजान शहर में स्पर्श कि परिभाषा लगभग भूल सा गया हूं , और इस खुराफात में मेरा अपना स्वार्थ छुपा है। खैर कुछ देर तक हाथ फेरने के बाद जब बिल्ली कुछ घबराई सी मेरी तरफ़ देखती है तब मेरे दिमाग में लाल बत्ती जल उठती है कि शायद इसे मेरा स्पर्श पसंद नहीं।</p><p>***</p><p>मैने ये लगभग स्वीकार किया हुआ था कि मैं स्वार्थी व्यक्ति हूं। पर बहुत बाद में ये पता चला कि ये एकांत प्रेम मेरे अंदरूनी व्यक्तित्व का हिस्सा न होकर संभवतः परिस्थितियों द्वारा थोपी हुई थीं।</p><p>2021 के कोविड का समय था। दिल्ली में एकांतवास के समय कोरोना वायरस ने तय किया कि मैं अब अकेला नहीं रहूंगा। लक्षण बिल्कुल न के बराबर थे फिर भी अपनी नजरअंदाजी के कारण एक रात मैं चक्कर खा कर जमीन पर गिरा कुछ घंटों बेहोश रहा। आश्चर्य कि उस बेसुधी में मैं अपनी हालत पर मुस्कुरा रहा था, मेरी आंखों में आंसू थे, और मैने ईश्वर से ये प्रार्थना की कि मुझे कल का सूरज दिख जाए।</p><p>अगली सुबह जैसे मेरे लिए एक नई जिंदगी ले आई। पिछली रात के बाद जीवन और मृत्यु के लिए एक गहरा दर्शन उभर कर सामने आया। अब किसी भी चीज के लिए देरी नहीं करनी थी। अपने व्यक्तित्व के विपरीत जाकर, कॉन्टैक्ट लिस्ट के समूचे 21 लोग जिनमें 13 मेरे अपने परिवार वाले थे, सबसे खूब बात की।</p><p>लिखने की शुरुआत उसके बाद ही हुई। 2021 से पूर्व मैने सिर्फ दो कविताएं, एक दो अंगरेजी में कहानियां लिखी थी जो बेहद जटिल थीं।</p><p>उस मनहूस रात के बाद, मैंने लोगों से ज्यादा करीब आना, उन्हें सुनना शुरू किया। जब उनका साथ अच्छा लगता मै देरी नहीं करता और उन्हें बता देता कि मुझे वो पसंद हैं।</p><p>***</p><p>पर इन दिनों बहुत ज़्यादा घुलना मिलना मुश्किल लगने लगा है। ऐसा लगता है बहुत ज्यादा हो गया। बहुत ज्यादा कह लिया, लिख दिया। हर एक दिन मेरे मन में ये सवाल उठता है कि ये कविताएं रच के, प्रेम गीत लिख कर मैं क्या पाना चाहता हूं। दुनिया से दूर भागने का मन होता है। पर सबसे दूर मैं खुश रहूं इसकी भी कोई गारंटी नहीं मिलती।</p><p>***</p><p>सच ये भी है कि मुझे लोग अच्छे लगने लगे हैं, ये दुनिया बहुत प्यारी लगती है। सबके लिए उपयोगी होना, सबकी छोटी छोटी मदद करना, उन्हें ढेर सारा प्यार करना मुझे अच्छा लगता है। पर दूसरी तरफ़ जब यही चीजें मुझे मिलती हैं, यानी जब कोई मुझसे बहुत प्रेम करने लगे, परवाह करने लगे, तो एक अजीब विकर्षण उत्पन्न होता है। इस अरुचि के पीछे कई वजहें हो सकती हैं पर मुझे नजर नहीं आती। और न हीं मैं ये दंभ भर रहा कि एक सिद्धपुरूष की तरह मैने सबकुछ जान लिया है, स्वीकार कर लिया है। जिंदगी कभी कभार जंग सी लगने लगती है, और मुझे लड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं। मुझे किसी निर्णय पर भी नहीं पहुंचना। क्योंकि कभी कभी निर्णय पर पहुंचने की जल्दबाजी में व्यक्ति बेवजह बहुत परेशान हो उठता है। मैं एक मूकदर्शक कि तरह समय गुजरते देख रहा हूं। सब स्वीकार है मुझे।</p><p>****</p><p>ये सब लिख ही रहा था कि बालकनी के फूलदानों के बीच संकरी सी जगह में सोती वह बिल्ली, कूदकर कमरे में घुस आई और बिल्कुल आहिस्ते मेरे पैर के दोनों अंगूठों पर बारी बारी अपना गर्दन रगड़ने लगी।</p><p>इंस्टमार्ट से छोटी छोटी चीजें मांगने वाला मैं निहायत ही आलसी आदमी, दौड़ कर अमूल की रबड़ी ले आया हूं। अपनी प्रकृति के अनुसार वो खाते हुए जैसे ये कह रही हो, <em>kneel and serve me you human!, but don’t expect anything in return</em>। और उसकी इस कृतघ्नता से मुझे कोई गुरेज नहीं।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#42 कीमियागिरी</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-42</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-42</guid>
      <pubDate>Mon, 08 Dec 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>freeverse</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>नियति को खूब खरी-खोटी
सुनाने के बाद, वह
थक के चुप हो गया।

ईश्वर उसकी मूढ़ता 
पर हंसता हुआ, उसे 
टूटते हुए देखता रहा था।

बड़बोला!
उसके सैंकड़ों दावे कि 
अब जान ही लिया है सब कुछ।
दहकती वासनाएं, अतृप्त लालसाएं
खोखली करती रही उसे।
ईश्वर अब भी चुप रहा।

एक दिन अपने पाखण्ड का
वजन लि</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>नियति को खूब खरी-खोटी<br>
सुनाने के बाद, वह<br>
थक के चुप हो गया।<br>
<br>
ईश्वर उसकी मूढ़ता <br>
पर हंसता हुआ, उसे <br>
टूटते हुए देखता रहा था।<br>
<br>
बड़बोला!<br>
उसके सैंकड़ों दावे कि <br>
अब जान ही लिया है सब कुछ।<br>
दहकती वासनाएं, अतृप्त लालसाएं<br>
खोखली करती रही उसे।<br>
ईश्वर अब भी चुप रहा।<br>
<br>
एक दिन अपने पाखण्ड का<br>
वजन लिए जोर से गिरा, धड़ाम!<br>
उसके टुकड़े ओछे थे।<br>
उसका अस्तित्व कृत्रिम था।<br>
भौचक, लज्जित, सिसकता हुआ,<br>
अपने अंत की गुहार लगाता रहा।<br>
<br>
ईश्वर अब हाजिर हुआ,<br>
निश्चल, निर्मल, चैतन्य<br>
हाथ खींचता हुआ<br>
अंक में भरता, पुचकारता<br>
तोड़ दिया संशय की गागरी।<br>
एक अद्भुत शिल्पकार! <br>
एक कुशल कीमियागर!<br>
<br>
शून्य शाश्वत अस्तित्व,<br>
शांत अराजकता,<br>
मौन भावहीन मुस्कान,<br>
हर एक स्पर्श, एक स्वाद।<br>
हर एक नज़र, शामिल हो होने का न्यौता।<br>
हर एक श्वास, चढ़ता उतरता समन्दर।<br>
<br>
हर एक विचार, एक अवसर।<br>
समूची सृष्टि का सामर्थ्य, उसके भीतर।<br>
पूरे जगत का प्रेम, उसके हृदय में।<br>
<br>
अब कुछ भी अप्राप्य नहीं था,<br>
जहां तक दृष्टि जाती सब<br>
उसका था, और वो,<br>
सबका।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#41 प्यार मेरे</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-41</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-41</guid>
      <pubDate>Thu, 04 Dec 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>Poetry</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>फेरो नज़र मेरी तरफ़ ऐ यार मेरे
इस बेरुखी की अब नहीं दरकार तेरे
इक चांद जो अटका हुआ मेरे फलक पर
छूकर उसे, ढलने दो अब सरकार मेरे

देखो जरा, कुछ जान बाक़ी रह गई हो
बे-रंग कबसे मैं पड़ा, तुम भी यहीं हो
कैद कर बाहों में मुझको ऐ सितमगर!
चूम लो, मुझे गुलज़ार कर दो यार मेरे

वायदा है आशि</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>फेरो नज़र मेरी तरफ़ ऐ यार मेरे<br>
इस बेरुखी की अब नहीं दरकार तेरे<br>
इक चांद जो अटका हुआ मेरे फलक पर<br>
छूकर उसे, ढलने दो अब सरकार मेरे<br>
<br>
देखो जरा, कुछ जान बाक़ी रह गई हो<br>
बे-रंग कबसे मैं पड़ा, तुम भी यहीं हो<br>
कैद कर बाहों में मुझको ऐ सितमगर!<br>
चूम लो, मुझे गुलज़ार कर दो यार मेरे<br>
<br>
वायदा है आशिक़ी पुर-ज़ोर होगी<br>
जिंदगी यूं ही नहीं बे-नूर होगी<br>
भूल कर शिकवे गिले, अहद-ए-मोहब्बत<br>
मुझसे फिर इकबार कर लो यार मेरे<br>
<br>
तेरी सांसों से चले ये सांस मेरी<br>
जाओगे ग़र, जान भी जाएगी मेरी<br>
बरस बैठीं तो रोके ना रुकेंगी मेरी आँखें<br>
ऐसे ना रूठा करो ऐ प्यार मेरे।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#40 ईश्वर</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-40</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-40</guid>
      <pubDate>Sun, 30 Nov 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>freeverse</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>एक ओर मेरा 
जितना ज्यादा रिक्त होते जाना;
उतना ही अधिक प्रेम और करुणा 
का उफनता ज्वार।
 
एक ओर
संशयों के बीज लिए
ये क्षणभंगुर काया;
दूसरी ओर
ये अनुभूति कि
समूचे ब्रह्मांड की सहस्त्र
भुजाएं मेरा अपना ही विस्तार।

एक ओर 
तुम्हारे क्रूर षड्यंत्र, 
अनगिनत दृश्य प्रपंच;
दूसरी ओर
मेरी</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>एक ओर मेरा <br>
जितना ज्यादा रिक्त होते जाना;<br>
उतना ही अधिक प्रेम और करुणा <br>
का उफनता ज्वार।<br>
 <br>
एक ओर<br>
संशयों के बीज लिए<br>
ये क्षणभंगुर काया;<br>
दूसरी ओर<br>
ये अनुभूति कि<br>
समूचे ब्रह्मांड की सहस्त्र<br>
भुजाएं मेरा अपना ही विस्तार।<br>
<br>
एक ओर <br>
तुम्हारे क्रूर षड्यंत्र, <br>
अनगिनत दृश्य प्रपंच;<br>
दूसरी ओर<br>
मेरी अविचल शाश्वत यात्रा।<br>
<br>
आश्चर्य!!<br>
विधाता तुझे भय है क्या?<br>
मेरे ईश्वर होने का।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#39 श्रृंगार</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-39</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-39</guid>
      <pubDate>Sun, 16 Nov 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>लघुकथा</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>राजधानी के गगनचुंबी स्वर्ण अट्टालिकाओं के बीच सूरज पूरी शक्ति के साथ चमक रहा था। पर उसकी रोशनी रनिवास तक पहुंचते पहुंचते धूमिल हो उठती थी। रनिवास क्षेत्र के मुख्य भवन में आकर्षण के लिए लगाए गए छोटे फव्वारे जिनमें घने कमलपुष्प खिले हुए थे, उन्हीं फव्वारों की एक ड्योढी पर एक हतभागी</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>राजधानी के गगनचुंबी स्वर्ण अट्टालिकाओं के बीच सूरज पूरी शक्ति के साथ चमक रहा था। पर उसकी रोशनी रनिवास तक पहुंचते पहुंचते धूमिल हो उठती थी। रनिवास क्षेत्र के मुख्य भवन में आकर्षण के लिए लगाए गए छोटे फव्वारे जिनमें घने कमलपुष्प खिले हुए थे, उन्हीं फव्वारों की एक ड्योढी पर एक हतभागी अपने श्यामल केश खोले बेसुध बैठी हुई थी। भूतल पर पड़े रत्नजड़ित आभूषण, नूपुर, करधनी, स्वर्ण मेखलाएं, इत्र, द्रव्य, सुगंधी और आज सुबह ही ले आए हुए पारिजात अब सूख आये थे। श्रृंगार के लिए लाए गए इन वस्तुओं पर उसकी जब भी नजर जाती, आंखों से जलधाराएं स्फूर्त हो उठती।</p><p>“महारानी! ये समय अश्रु बहाने का नहीं है। पाणिग्रहण का समय समीप आ रहा है। आप शीघ्र ही तैयार हो जाएं।” रनिवास की एक दासी बोल उठी।</p><p>मंजरी! अरी मंजरी! तू भी बड़ी निष्ठुर निकली रे! तुझे क्या ये स्मरण नहीं कि मेरा पाणिग्रहण हो चुका है। याद कर मैं इसी राज्य के एक राजकुमार संग ब्याही गई थी। ओ सखी! तुझे तो पिताश्री ने मेरे देखभाल के लिए संग भेजा था। राजसी चकाचौंध में तू क्या मर्यादाएं भी भूल बैठी?</p><p>हाय विधाता! तू कितना क्रूर हो सकता है ये मैंने आजतक कालिदास के काल्पनिक काव्यों में ही पढ़ा था। आज रात त्रियामा में ही मेरे इन हाथों ने अपने स्वामी का रक्त पोंछा है। और फिर इसी दिन मेरे इन रक्तरंजित हाथों पर मेहंदी लगाने का आदेश। मैं जब ब्याह के आई थी ये चन्द्र अभी किशोर था। पाटलिपुत्र के अनंत तक फैले राजस्तंभो में शिकार का खेल खेलने निकल पड़ता। तुझे भी याद होगा मंजरी! एक बार चंद्र के हाथों से भूलवश बाण राजनिवास में ठहरे किसी विदेशी दूत को जा लगा था। दूत को थोड़ी चोट आई थी, बाहों से रक्तस्राव हो रहा था। चंद्र मूर्छित हो गया था और मंजरी! तू ही उसे रनिवास ले आई थी। चार दिवस छुपा रहा था मेरे पास। राम के बार बार दिलासा दिलाने पर भी कि दूत स्वस्थ है, जीवित है, वो बाहर नहीं निकला। स्वयं मेरे दिवंगत श्वसुर परम भागवत समुद्रगुप्त उसे समझा बुझा कर वापस लेने आए थे।</p><p>सखी! मुझे सच बताओ क्या ये वही चन्द्र है। उदयगिरी का नीतिकार वीरसेन सच बोलता है कि राजदंड में विषधर छुपे रहते हैं। परंतु ये सत्ता लोलुपता क्या इतनी प्रबल होती है कि ये हलाहल, चन्द्र जैसे कोमल कुमार को स्वयं अपने भाई का हत्यारा बना दे।</p><p>मंजरी के साथ साथ मुख्य प्रचारिका रमा और मालती रनिवास में महारानी ध्रुवदेवी के करुण चीत्कार मूर्तवत खड़ी सुनती रहीं। सूरज की शक्ति कुछ और शिथिल हो चली थी। विधाता का ये क्रूर निर्णय सुन संभवतः वो भी निस्तेज हो कलिकाल के चक्र को देखने लगा।</p><p>उधर अंतरपुर में नगरवधु वसंतसेना की बाहपाश में पड़ा चन्द्र अपने हाथ खींचते, आमोद से चीख पड़ा, “अब बस करो बासंती! मुझे विवाह के लिए विलंब होगा।”</p><p>दूर नगर से भेरी वादकों के वाद्ययंत्रों की गूंज रुक रुककर रनिवास पहुंचती रही। नगरघोषकों का एक समूह कोने कोने में कुंतल राजकुमारी और पिछली ही रात अपने स्वामी रामगुप्त के हत्या से बेसुध महारानी ध्रुवस्वामिनी और चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के विवाह की उद्घोषणा करने में व्यस्त था।</p><p>महारानी अपने पैरों को लगभग घसीटते हुए मंजरी के पास पहुंची और टूटते स्वर में कहा, “इन रक्तरंजित हाथों को धो डाल मंजरी! यदि विष्णु यही चाहते हैं कि मैं चौसर के मोहरों की तरह एक राजपुरूष से दूसरे राजपुरूष के पास बदली जाती रहूं तो फिर यही ठीक। मालती को भेज कुछ नए हरसिंगार के पुष्प मंगा ले। मुझे श्रृंगार करना है।</p><p>(समाप्त)</p><hr><p><strong>पृष्ठभूमि</strong> : विशाखदत्त के नाटक देवीचंद्रगुप्तम के अनुसार, गुप्त सम्राट रामगुप्त ने अपनी पत्नी ध्रुवदेवी को शक शत्रु को सौंपने का निर्णय लिया। उनके भाई चंद्रगुप्त द्वितीय ने हस्तक्षेप किया, शत्रु को मारकर रामगुप्त को हटा दिया और ध्रुवदेवी से विवाह कर लिया।</p><p>कुछ इतिहासकार इस विवरण को संदेहास्पद मानते हैं और कहते हैं कि रामगुप्त चंद्रगुप्त की कूटनीति का शिकार हुआ। सत्यता के परीक्षण से इतर ध्रुवदेवी की मनोदशा का वर्णन करता लघुकथा के रूप में यह मेरा एक छोटा सा प्रयास था।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#38 वापसी</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-38</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-38</guid>
      <pubDate>Thu, 30 Oct 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>Uncategorised</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>त्यौहारों के ख़त्म होते ही ऐसा लगता है मानो टीवी पर कार्टून देख रहे बच्चे को जबरदस्ती पढ़ने के लिए बिठा दिया गया हो। चंद घंटों पहले की चहल-पहल तुरंत शांत हो जाती है। मानो गहरी नींद से उठा कर तेज भागने को कह दिया जाए। पैर के साथ साथ शरीर भी शून्य पड़ जाता है। ये अनुभव जन्मजात है।</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>त्यौहारों के ख़त्म होते ही ऐसा लगता है मानो टीवी पर कार्टून देख रहे बच्चे को जबरदस्ती पढ़ने के लिए बिठा दिया गया हो। चंद घंटों पहले की चहल-पहल तुरंत शांत हो जाती है। मानो गहरी नींद से उठा कर तेज भागने को कह दिया जाए। पैर के साथ साथ शरीर भी शून्य पड़ जाता है। ये अनुभव जन्मजात है। अनगिनत बार स्फूर्त होता है। इसे विस्मय से ना देखा जाए। हजारों बार, जब वापस लौटना होता है, गांव से शहर, घर से स्कूल, मायके से ससुराल या फ़िर जब इस दुनिया से अलग।</p><p>एक खूबसूरत मेला, हजारों संगी साथी। हर कदम पर उल्लास, रंग और रस। ज्वार की तरह छलांग मारती जिंदगी। उफान की ओर सब अच्छा लगता है। जोर लगाते सब कुछ पा लेने की चाह, अतृप्त लालसाएं। पर जो चढ़ता है उसका उतरना भी तय है। ये सबको मालूम है। फिर ऐसा क्यों होता है कि इस सार्वभौम नियम को जानने के बाद भी मन उद्विग्न होने लगता, चिंतित होने लगता है। ये बिछड़ना, ये वापस लौटना इतना मुश्किल क्यों होता है, इसकी आदत क्यूं नहीं पड़ती।</p><p>***</p><p>मेरा घर गांव के बिल्कुल आखिरी छोर पर है। उसके ठीक सामने एक घना, बलिष्ठ, पर निहायत ही खूबसूरत नीम का पेड़ है। आस-पास आंवला, अमरूद और नींबू जैसे छोटे पेड़ बेतरतीब कतारों में लगाए गए हैं या उग आए हैं। दाहिनी तरफ जो कुछ जगह बची है वहां लंबे बांसों का एक कुनबा रास्ता रोके खड़ा हैं। इनके जड़ से सर तक का विस्तार देख कर लगता है कि इनके पुरखे निश्चित ही कोई खूंखार दैत्य रहे होंगे जो शायद किसी श्राप से बांस बने खड़े हैं।</p><p>इन भूमिजातों की ही कृपा है कि हर घड़ी घर की छत पर खूबसूरत पंछियों का एक झुंड चहलकदमी करते मिलता है। ऐसा नहीं कि ये पंछी डरे या सहमे हुए हैं। इनकी गर्वीली चाल और मुखर चहक देख सुन ये लगता है कि इनके (माप के आधार पर) छोटे से दिमाग़ में मुमकिन है ये भाव बिंबित हो कि ये छत उनकी पुश्तैनी जायदाद है।</p><p>अभी कल ही चार कौओं और बिल्ली के एक बच्चे की तू-तू, मैं-मैं (या फिर कांव- कांव, म्याऊं-म्याऊं) देखने का दुर्लभ सौभाग्य प्राप्त हुआ। मुझे देख कौवे भाग गए। पर इसमें कोई संदेह नहीं कि बिल्लौटे को ये लगा होगा कि कौवे उससे डर के भागे हैं। बिल्लियां मुझे कभी पसंद नहीं थी। मैने हमेशा उन्हें संदेह की दृष्टि से देखा है। कभी सीढ़ियों पर या बड़े से घर के कोने में आमना सामना होता तो ऐसे मूर्तवत (stoned) होती जैसे दुनिया की साम्राज्ञी होने के साथ साथ उन्होंने अदृश्य होने का भ्रम भी पाल रखा हो। ऐसी पैनी नजर से देखती जैसे आत्मा ही टटोल रही हो। इनके शहरी रिश्तेदार थोड़े ज्यादा कुलीन हैं। गोरा रंग, और गाड़ियों, स्कूटरों पर बैठे दिन भर सोती रहती हैं। गांव की भूरी बिल्लियों जितना उन्हें संघर्ष नहीं करना पड़ता।</p><p>नीम के ऊपरी हिस्से में अंग्रेजी वर्णमाला के वाई के आकार की एक टहनी है जिसपर एक बड़ा लंगूर बैठा दिखता है। ये उस छोटे से लंगूरों के झुंड का मुखिया है जो गांव की छतों से होकर गुजरता है। रास्ते में बच्चे, बूढ़ों के हाथ जो भी खाने का दिख जाए ले जाता है। लंबी पूंछ और काले मुंह वाले ये बंदर काटते नहीं सिर्फ डरा धमका कर चीजें छीन लेते हैं। इनका मुखिया पूर्वजन्म का गांधीवादी लगता है।</p><p>मैंने ये चक्र बचपन से ही देखा है। गौरैया और कौओं का सुबह सुबह दाना चुगने पहुंच जाना, बिल्लियों से यदा कदा छोटी झड़पें, बंदरों का आना और उछल कूद मचाना। अब भी छुट्टियों में हर रोज़ मै ये रंग अपने भीतर समेटता हूं। घर छोड़ शहर लौटने के पहले की शाम मैं छत के हर एक कोने से सुदूर दिख रहे खेत खलिहान, पेड़ पौधे, घोंसलों से अनवरत गीत गा रहे पंछियों को अपने भीतर भर लेता हूं। शहर की भीड़ में ये मेरी अस्तित्व के खूबसूरत विस्तार बन मेरी हिफाजत करते हैं।</p><p>मम्मी की आँखें एक दिन पहले से ही नम होनी शुरू हो जाती हैं। मैने उन्हें नम ही देखा है। बहनें बताती हैं, मेरे घर छोड़ने से शहर पहुंचने तक वे जोरदार बरसती हैं।</p><p>***</p><p>बीते साल नीम पर मिट्टी की एक सफेद मोटी परत चढ़ गई थी। उसकी निमौलियां ऊपर ही सूख जाती। मुझे याद है मेरे उपद्रवी मन ने इसके मृत्यु की खूब चिट्ठियां बाँची थी।</p><p>कल शाम इसे ध्यान से देखा तो ये पहले से और अधिक ज़ोरदार तरीके से झूमता और मुंह चिढ़ाता सा दिखा। पूरे बदन से मिट्टी गायब हो गई थी और उसकी जगह नए कोमल छालों ने ले ली थी।</p><p>“कितनी अच्छी बात है!और कितना खूबसूरत बदलाव है!”</p><p>घर से बिछड़ने की पिछली शाम हमेशा की तरह आसपास के दृश्य संजोते हुए मैं अपनी मूर्खता पर हंस पड़ा।</p><p>लौटना और भी ज्यादा खूबसूरत है, ये तो मेरी जड़ता है जो वापस लौटना नहीं चाहती। जीवन का असली मज़ा तो चलते रहने में है। जिंदगी जब उतर रही हो तब भी परेशान होना व्यर्थ है। यहां तक कि अर्थ-व्यर्थ का ये मोलभाव भी बेमानी है। जिदंगी है, हर तरीक़े के अनुभव होंगे। संभवतः असली सुख, मिलने बिछड़ने के परिकल्पना के बीच सपाट पड़े सन्नाटे में हैं।</p><p>सबका ईश्वर इसी सन्नाटे में हाथ थामने को तैयार बैठा है। और वो सारथी है गांव से शहर, घर से स्कूल, मायके से ससुराल या फ़िर इस दुनिया से दूर की यात्रा का। एक चक्र है जो घूमते रहता है, इस यात्रा में वापसी तय है, लौटना तय है। और ये भी संभव है कि जाने और वापस लौटने की अनुभूति महज़ एक दृश्य प्रपंच हो।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#37 मयरिया</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-37</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-37</guid>
      <pubDate>Mon, 27 Oct 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>भोजपुरी कविता</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>कातिक महिनवा मे सूरूज ठंडइलें 
लागल भोरे बहे शीतली बयरिया
निमिया पर बईठल, चिरईया भी गावे 
एही मासे अइहें रे हमरो मयरिया

काल्हे दुपहरिया में कान्हा पर झोरा
कपड़ा, मिठाई आ फ़ल थोड़ा थोड़ा
लेहले फलनवा कऽ बाबूजी अइले
बेटवा मेहरिया के मन हरसइलें 
खूबे सजल बा हो गउवां नगरिया
घाटे उतरिह</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>कातिक महिनवा मे सूरूज ठंडइलें <br>
लागल भोरे बहे शीतली बयरिया<br>
निमिया पर बईठल, चिरईया भी गावे <br>
एही मासे अइहें रे हमरो मयरिया<br>
<br>
काल्हे दुपहरिया में कान्हा पर झोरा<br>
कपड़ा, मिठाई आ फ़ल थोड़ा थोड़ा<br>
लेहले फलनवा कऽ बाबूजी अइले<br>
बेटवा मेहरिया के मन हरसइलें <br>
खूबे सजल बा हो गउवां नगरिया<br>
घाटे उतरिहें रे हमरो मयरिया<br>
<br>
घटवा सजावऽ हो! पोखरा भरावऽ <br>
जा छठी मइया के नेवता पेठावऽ <br>
उगिहें आदितमल, मिटी अन्हरिया<br>
गद-गद भइल आरे मनवा भितरिया <br>
किरपा देखईहें रे हमरो मयरिया<br>
<br>
नरियल, शरीफा, केरा आ सेउवा <br>
सुथनी, हरदिया आ गागल निमउआ<br>
भोरवे से जगके अंगना सजावे<br>
नवकी दुलहनिया ठेकुआ बनावे<br>
बड़ा सुंदर भरल बाटे सुपवा दउरिया<br>
देखी जुड़ईली रे हमरो मयरिया<br>
<br>
घीउआ के बाती के दियना जरा के<br>
जल बीच खड़ा होके हथवा जुड़ाके <br>
अरघ सकारी हे सूरूज गोसईंया<br>
बिट्टू नेवावेलें सिरवा, पगड़िया<br>
सरधा पुरइहऽ ए हमरो मयरिया 🌸</p><hr><p>🌼🌿English Translation 🌿🌼</p><p><em>कातिक महिनवा मे सूरूज ठंडइलें <br>
लागल भोरे बहे शीतली बयरिया<br>
निमिया पर बईठल, चिरईया भी गावे <br>
एही मासे अइहें रे हमरो मयरिया</em><br>
<br>
The sun cools in the month of Karthik,<br>
A cold, refreshing breeze begins to blow at dawn.<br>
Birds perched on the neem tree sing their joyful songs,<br>
For in this very month, our Mother (Chhath Ma) will arrive!<br>
<br>
***<br>
<br>
<em>काल्हे दुपहरिया में कान्हा पर झोरा<br>
कपड़ा, मिठाई आ फ़ल थोड़ा थोड़ा<br>
लेहले फलनवा कऽ बाबूजी अइले<br>
बेटवा मेहरिया के मन हरसइलें <br>
खूबे सजल बा हो गउवां नगरिया<br>
घाटे उतरिहें रे हमरो मयरिया</em><br>
<br>
Just yesterday afternoon, with a bag upon his shoulder,<br>
Carrying clothes, sweets, and a modest quantity of fruits,<br>
The Babu-ji (Father) of Falanwa (Anonymous) has arrived (from the city),<br>
Filling the hearts of the children and wife with happiness.<br>
The entire village and town are beautifully decorated,<br>
Our Mother (Chhath Ma) will descend upon the river banks (Ghats).<br>
<br>
***<br>
<br>
<em>घटवा सजावऽ हो! पोखरा भरावऽ <br>
जा छठी मइया के नेवता पेठावऽ <br>
उगिहें आदितमल, मिटी अन्हरिया<br>
गद-गद भइल आरे मनवा भितरिया <br>
किरपा देखईहें रे हमरो मयरिया</em><br>
<br>
“Go, decorate the Ghats! Fill the sacred ponds!”<br>
“Go, extend the invitation to Chhathi Ma (The revered Goddess)!”<br>
The Sun God (Aaditmal) will rise, and the darkness will be erased.<br>
Our innermost hearts are overflowing with pure joy and devotion,<br>
Our Mother (Chhath Ma) will surely show Her kindness and grace.<br>
<br>
***<br>
<br>
<em>नरियल, शरीफा, केरा आ सेउवा <br>
सुथनी, हरदिया आ गागल निमउआ<br>
भोरवे से जगके अंगना सजावे<br>
नवकी दुलहनिया ठेकुआ बनावे<br>
बड़ा सुंदर भरल बाटे सुपवा दउरिया<br>
देखी जुड़ईली रे हमरो मयरिया</em><br>
<br>
Coconuts, custard apples, bananas, and apples,<br>
Lesser yam (Suthni), turmeric plants, and sweet pomelos (Gagal),<br>
Waking before the break of dawn, the courtyard is being decorated.<br>
The new bride is lovingly preparing Thekua (a traditional sweet delicacy).<br>
See how beautifully the bamboo winnowing baskets (Sup) and large baskets are filled,<br>
Our Mother (Chhath Ma) will be content and pleased upon seeing this offering.<br>
<br>
***<br>
<br>
<em>घीउआ के बाती के दियना जरा के<br>
जल बीच खड़ा होके हथवा जुड़ाके <br>
अरघ सकारी हे सूरूज गोसईंया<br>
बिट्टू नेवावेलें सिरवा, पगड़िया<br>
सरधा पुरइहऽ ए हमरो मयरिया 🌸</em><br>
<br>
Lighting lamps with wicks dipped in pure Ghee,<br>
Standing in the water with hands folded in deep reverence,<br>
“O Sun God (Suruj Gosaiyan), please accept this morning offering (Sakaari Aragh).”<br>
Bittu (writer's nickname) bows his head in complete surrender and faith,<br>
“Fulfill all our aspirations, O our Mother (Chhath Ma)!”</p><hr><p>Happy Chhath Puja! This festival is a beautiful representation of our ancient culture, celebrating Mother Nature and showing devotion to the Sun God, who is fundamental to all life on Earth. 🌻</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#36 उलफ़त</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-36</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-36</guid>
      <pubDate>Sun, 19 Oct 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>कविता</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>ये अजब गज़ब के वादे कि 
ले आऊं तोड़ सितारे मैं?
पुर-ज़ोर चमकना चेहरा उसका
जैसे ले ही आया सारे मैं

पहलू में बैठे मेरे यूं
बहकी बातें कर जाती वो
फ़िर बात-बात के पेंच खोल
जोरों हंसती, खो जाती वो

उस शोख कली के आते ही
एक ख़ुश-रंगी गुलजार खिले
बरसों उकताए बच्चे को
बचपन का बिछड़ा यार</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>ये अजब गज़ब के वादे कि <br>
ले आऊं तोड़ सितारे मैं?<br>
पुर-ज़ोर चमकना चेहरा उसका<br>
जैसे ले ही आया सारे मैं<br>
<br>
पहलू में बैठे मेरे यूं<br>
बहकी बातें कर जाती वो<br>
फ़िर बात-बात के पेंच खोल<br>
जोरों हंसती, खो जाती वो<br>
<br>
उस शोख कली के आते ही<br>
एक ख़ुश-रंगी गुलजार खिले<br>
बरसों उकताए बच्चे को<br>
बचपन का बिछड़ा यार मिले<br>
<br>
सरे राह गुजरते, मंदिर में<br>
हाथों का बरबस जुड़ जाना<br>
खुद बेखुद होकर, दूजे की<br>
खुशियों की अर्जी दे आना<br>
<br>
मिसरी सी मीठी लगती<br>
थोड़ी खारी लगती है<br>
उसके साथ ये दुनिया अब<br>
कुछ और भी प्यारी लगती है</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#35 यूं ही नहीं बीतेंगे दिन</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-35</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-35</guid>
      <pubDate>Mon, 29 Sep 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>मुक्तक</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>संशयों का एक मायावी दानव
तैयार बैठा था लीलने को
सारी उम्मीदें, सारे सपने
कर देने को निष्प्राण

तैयार बैठा था 
मन में ढूंढने को एक कोना
जो मिलते ही कर दे मुझे निहत्था 
और उड़ेल दे ढेर सारा विष
हताशा, संदेह, और दुःख 

कितने ही रातें
मैं हतभागा 
मृत्युदंड की प्रतीक्षा करता 
बिखरता र</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>संशयों का एक मायावी दानव<br>
तैयार बैठा था लीलने को<br>
सारी उम्मीदें, सारे सपने<br>
कर देने को निष्प्राण<br>
<br>
तैयार बैठा था <br>
मन में ढूंढने को एक कोना<br>
जो मिलते ही कर दे मुझे निहत्था <br>
और उड़ेल दे ढेर सारा विष<br>
हताशा, संदेह, और दुःख <br>
<br>
कितने ही रातें<br>
मैं हतभागा <br>
मृत्युदंड की प्रतीक्षा करता <br>
बिखरता रहा बूंद बूंद<br>
टूटता रहा हर सांस<br>
<br>
***<br>
<br>
फिर एक सुबह<br>
घर से थोड़ी दूर <br>
चलते हुए<br>
हवा का एक हल्का सा झोंका<br>
मुझे चूम गया बरबस<br>
<br>
और मन में डेरा जमाए <br>
बैठा हुआ वो निष्ठुर दानव<br>
थोड़ी देर, बस थोड़ी देर के लिए<br>
गायब हो गया था<br>
<br>
मैने तय किया, कि अब<br>
यूं ही नहीं बीतेंगे दिन<br>
बेबसी में, अपराधबोध में<br>
ले आऊंगा रोशनी<br>
रात चांदनी से मांग<br>
 <br>
ऐसी दुनिया बनाऊंगा <br>
जिसमें बरसेगा प्रेम<br>
और उमड़ आयेगा जीवन<br>
चहुंओर।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#34 स्पर्श</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-34</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-34</guid>
      <pubDate>Sat, 23 Aug 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>कविता</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>सोचो वे बड़े सुभागे होंगे! 
कितनी रातों को जागे होंगे!
परस्पर्श नहीं जिनके जीवन, 
क्या गीत प्रेम के गाते होंगे?

कुहक कुहक कोमल केकी, 
जब राग मीत के गाती होगी।
सावन की सुघन बदरी,
जब धूप, छांव कर जाती होगी।

मन ही मन अकुलाते होंगे, 
उत्सवों से भय खाते होंगे।
सूने अंक लाचार पड़े,</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>सोचो वे बड़े सुभागे होंगे! <br>
कितनी रातों को जागे होंगे!<br>
परस्पर्श नहीं जिनके जीवन, <br>
क्या गीत प्रेम के गाते होंगे?<br>
<br>
कुहक कुहक कोमल केकी, <br>
जब राग मीत के गाती होगी।<br>
सावन की सुघन बदरी,<br>
जब धूप, छांव कर जाती होगी।<br>
<br>
मन ही मन अकुलाते होंगे, <br>
उत्सवों से भय खाते होंगे।<br>
सूने अंक लाचार पड़े, <br>
पाथर ही बन जाते होंगे!<br>
<br>
गरज प्रेम की उन्हें अधिक, <br>
जो प्रेम-प्रेम चिल्लाते हैं।<br>
गरज दैव की उन्हें अधिक, <br>
जो हरि-हरि गुण गाते हैं।<br>
<br>
परस्पर्श नहीं फिर भी वो, <br>
गीत प्रेम के गाते होंगे।<br>
निश्चय ही डूबते प्राणों के, <br>
बन तारणहार हर्षाते होंगे।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#33 पूजन</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-33</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-33</guid>
      <pubDate>Wed, 20 Aug 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>कविता (freeverse)</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>प्रेमिकाएं अभिनत थीं
उन्होंने उन्मुक्त कंठ से 
स्तुति की, गीत गाए 
उनके स्वामित्व और अपेक्षाओं
ने चीख चीखकर
रिक्त विज्ञप्त किया।
जब भी गईं 
तोड़ गईं।

नायिकाएं कठोर थीं
उनका दर्पण सिर्फ उनकी
ओर ही खुलता था।
स्वयं को निहारते, इठलाते
झांक लेती थी कभी कभार मेरी ओर
कनखियों से।
सौंदर्</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>प्रेमिकाएं अभिनत थीं<br>
उन्होंने उन्मुक्त कंठ से <br>
स्तुति की, गीत गाए <br>
उनके स्वामित्व और अपेक्षाओं<br>
ने चीख चीखकर<br>
रिक्त विज्ञप्त किया।<br>
जब भी गईं <br>
तोड़ गईं।<br>
<br>
नायिकाएं कठोर थीं<br>
उनका दर्पण सिर्फ उनकी<br>
ओर ही खुलता था।<br>
स्वयं को निहारते, इठलाते<br>
झांक लेती थी कभी कभार मेरी ओर<br>
कनखियों से।<br>
सौंदर्य बल से<br>
उन्होंने उपासना मांगी,<br>
चाही एक मधु लिप्त दासता।<br>
<br>
कुछ लड़कियां ऐसी थीं<br>
जिनके स्नेह और समर्पण ने<br>
ख़ूब संजोया, संवारा।<br>
प्रीत की लहलहाती फ़सल <br>
देख ख़ुद खिलखिलाईं, चहकीं <br>
पर बदले में कुछ नहीं मांगा<br>
फिर अनायास<br>
समाज के एक इशारे पर<br>
कुव्यवस्थाओं के घनघोर<br>
अंधेरे में ओझल हो गईं।<br>
<br>
फिर कुछ ऐसी भी थीं<br>
जिन्होंने स्तुति तो की,<br>
पर आंखों में आंखे डाल<br>
उपासना भी मांगी।<br>
कुव्यवस्थाओं को ठुकरा<br>
उड़ती रहीं स्वच्छंद, <br>
उनके प्रेम ने मुझे सशक्त किया<br>
और वे स्वयं भी निखरी हो दिव्य।<br>
ऐसी देवियों, स्वामिनियों की प्रशंसा में <br>
मैंने गीत रचे, कविताएं गढ़ी<br>
अविरत।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#32 एक कतरा सुख</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-32</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-32</guid>
      <pubDate>Thu, 14 Aug 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>कविता (freeverse)</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>कुछ बिखरा होगा बरसों पहले
कोई चोट आई होगी दिल पर
एक गहरा संताप 
या फिर बहुत थोड़ी मामूली सी बेचैनी,

न जाने क्यों
पसरी रहती है इनकी कालिमा
जैसे पूनम की चांद को
घेर लिए हों बादल घनेरे।

दुखों का वज़न 
शायद ज्यादा होता है
खुशियों से!

ऐसा क्यों नहीं होता
कि जब वो अल्हड़ बयार
छेड़ ज</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>कुछ बिखरा होगा बरसों पहले<br>
कोई चोट आई होगी दिल पर<br>
एक गहरा संताप <br>
या फिर बहुत थोड़ी मामूली सी बेचैनी,<br>
<br>
न जाने क्यों<br>
पसरी रहती है इनकी कालिमा<br>
जैसे पूनम की चांद को<br>
घेर लिए हों बादल घनेरे।<br>
<br>
दुखों का वज़न <br>
शायद ज्यादा होता है<br>
खुशियों से!<br>
<br>
ऐसा क्यों नहीं होता<br>
कि जब वो अल्हड़ बयार<br>
छेड़ जाती है मुझे, कर <br>
खुशियों से सराबोर,<br>
<br>
या फिर पैरों में लिपट रही<br>
नाज नखरे दिखाती बिलैया <br>
मुदित कर देती है, मेरा<br>
रोम-रोम<br>
<br>
उन चंद पलों का असीम आनंद <br>
क्यूं काफी नहीं <br>
जीवन भर के लिए<br>
<br>
ग़मों की उमर<br>
ज़्यादा क्यूं होती है?<br>
<br>
एक कतरा सुख<br>
क्या काफ़ी नहीं<br>
हमेशा के लिए!</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#31 इसक</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-31</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-31</guid>
      <pubDate>Sun, 27 Jul 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>कविता</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>मैं इधर देखूं या उधर देखूं
वो ही नज़र आए जिधर देखूं
इसक की रंग का गहरा असर है
न कोई ग़म, न कोई फ़िकर है

ज़माना सुर्ख आंखे लाल लेकर
कंटीले कायदों की ढाल लेकर
भले चाहे मिटाना प्रेम मेरा
पर इस रात का होगा सवेरा

संवर महबूब के साए-शजर में
गहरी नीली आंखों के सफ़र में
पुरानी सूनी शाखें</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>मैं इधर देखूं या उधर देखूं<br>
वो ही नज़र आए जिधर देखूं<br>
इसक की रंग का गहरा असर है<br>
न कोई ग़म, न कोई फ़िकर है<br>
<br>
ज़माना सुर्ख आंखे लाल लेकर<br>
कंटीले कायदों की ढाल लेकर<br>
भले चाहे मिटाना प्रेम मेरा<br>
पर इस रात का होगा सवेरा<br>
<br>
संवर महबूब के साए-शजर में<br>
गहरी नीली आंखों के सफ़र में<br>
पुरानी सूनी शाखें खिल गई है<br>
ये रंगीन बारिश कुछ नई है<br>
<br>
बरसती चांदनी मुझपर ऐसी निखरी<br>
जंजीरे फ़लसफों की टूटी-बिखरी<br>
बर्ग-ओ-गुल लबों पर पिघल रहा हूं<br>
मैं कतरा-कतरा उसमें ढल रहा हूं।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#30 सांख्य योग</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-30</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-30</guid>
      <pubDate>Tue, 15 Jul 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>कविता</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>जीत हार का दंश, नहीं विचलित करता जिस नर को,
तन, मन, धन सर्वस्व होम कर, फिरता निर्भीक समर को।
मिथ्याओं के बीच बात जो सत्य शील की करता है,
षड्यंत्रों से मुक्त, जग में द्वेष नहीं करुणा भरता है।

भूखण्ड जीत ले फ़िर भी जिसमें लेशमात्र का दर्प नहीं,
क्षणभंगुर भव का भान जिसे, उठ जाए गिर</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>जीत हार का दंश, नहीं विचलित करता जिस नर को,<br>
तन, मन, धन सर्वस्व होम कर, फिरता निर्भीक समर को।<br>
मिथ्याओं के बीच बात जो सत्य शील की करता है,<br>
षड्यंत्रों से मुक्त, जग में द्वेष नहीं करुणा भरता है।<br>
<br>
भूखण्ड जीत ले फ़िर भी जिसमें लेशमात्र का दर्प नहीं,<br>
क्षणभंगुर भव का भान जिसे, उठ जाए गिर के तुरत वहीं।<br>
विपदाओं के सन्मुख भी न हार जिस पौरुष ने मानी, <br>
अनुकूल प्रतिकूल सभी समतुल्य दिखे ऐसा ज्ञानी।<br>
<br>
जिसने छोड़ी नहीं तपस्या, बाधाओं से घबराकर,<br>
एक जन्म में जीता जो कल्पों का जीवन सागर।<br>
ऐसा वीर रणबांकुर जब संकल्प पर आकर अड़ता है,<br>
स्वयं, नियति को नतमस्तक होकर सब कुछ देना पड़ता है।<br>
<br>
नरता के दीपक की आभा, बढ़ती संघर्ष अपनाकर,<br>
जग रौशन करता अभीत, अपनी जान लगाकर।<br>
धर्मचक्र का रथ ऐसे सूरमाओं से ही चलता है,<br>
देव पूजते कोख जहां ऐसा अतुलनीय यश पलता है।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#29 सावन</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-29</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-29</guid>
      <pubDate>Sat, 12 Jul 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>कविता</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>न महुए छुए
ना आंख लगाई
जोगी-सा किसी वट के नीचे
कभी ना हमने, धूनी रमाई

द्वंद्वों में पलते जीवन को
रहती है आस कहां बूंदों की?
आंखों का रंग गिर जाता है
कंटक पथ के बाशिंदों की

स्मृतियों को तह में, फिर 
आज कौन ये रंगता है
मौसम की बदली सूरत
कोई प्रपंच लगता है

हरियाली की चादर पनपी
हि</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>न महुए छुए<br>
ना आंख लगाई<br>
जोगी-सा किसी वट के नीचे<br>
कभी ना हमने, धूनी रमाई<br>
<br>
द्वंद्वों में पलते जीवन को<br>
रहती है आस कहां बूंदों की?<br>
आंखों का रंग गिर जाता है<br>
कंटक पथ के बाशिंदों की<br>
<br>
स्मृतियों को तह में, फिर <br>
आज कौन ये रंगता है<br>
मौसम की बदली सूरत<br>
कोई प्रपंच लगता है<br>
<br>
हरियाली की चादर पनपी<br>
हिय हर्षाता बादल उमड़ा <br>
झूम उठा सावन सुंदर <br>
दृश्य बड़ा मनभावन निखरा <br>
<br>
बूंद-बूंद से निर्मल करता<br>
प्राण सहित पूरे तन को<br>
सावन है या इंद्रजाल<br>
जो उन्मत कर दे कण-कण को<br>
<br>
प्रेम सुधा की बारिश <br>
कब तक रोक सकेगा जिद्दी मन<br>
गीत, प्रीत का रचते बुनते <br>
चमकेगा होकर और सघन ☘️</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#28 कई चाँद हैं सर-ए-आसमां</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-28</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-28</guid>
      <pubDate>Mon, 07 Jul 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>भाग एक</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>ट्रेन किसी छोटे से स्टेशन से गुजर रही थी। बनारस आने में अभी दो घंटे बाक़ी थे। अमर की नजर खिड़की से बाहर पेड़ों कि झुरमुट में छिपते निकलते सांझ के सूरज पर टिक गई। एक धुंधली हुई याद उसके जेहन में कौंधी —जिसमें एक छोटा अमर अपनी अम्मा की गोद में बैठा पहली बार ट्रेन से अपने ननिहाल जा</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>ट्रेन किसी छोटे से स्टेशन से गुजर रही थी। बनारस आने में अभी दो घंटे बाक़ी थे। अमर की नजर खिड़की से बाहर पेड़ों कि झुरमुट में छिपते निकलते सांझ के सूरज पर टिक गई। एक धुंधली हुई याद उसके जेहन में कौंधी —<em>जिसमें एक छोटा अमर अपनी अम्मा की गोद में बैठा पहली बार ट्रेन से अपने ननिहाल जा रहा था</em>। ऐसी जीवंत याद कि पल भर के लिए वो भूल ही बैठा कि वह कितना उदास और बेचैन है। ट्रेन की तेज़ और चिड़चिड़ी हॉर्न ने उसे वापस वर्तमान में लौटने पर मजबूर कर दिया।</p><p>अमर ने मन ही मन सोचा कि काश ये सफ़र ऐसे ही चलता रहे क्यूंकि जिस परिस्थिति से वह गुजर रहा था वह प्रेम, अन्तर्द्वंद और दुःख का ऐसा मिश्रण था जिसको समझ पाना उसके बस की बात नहीं थी। उसने एक हसीन वहम चुना जिसमें अब भी सबकुछ ठीक था क्योंकि उसमें इस सच को स्वीकार करने की हिम्मत नहीं थी जिसमें बिन्नू उससे दूर, बहुत दूर जा रही थी। पूरे रास्ते उसके मन में पिछले तीन सालों की तमाम यादें ताज़ी होनी शुरू हो गईं।</p><p>****</p><p>“<em>गांव के लड़कों का यहीं प्रॉब्लम है भाई। भरी जवानी तक लड़कियों से बात नहीं करेंगे और एक बार अगर यूनिवर्सिटी में किसी लड़की ने बात कर ली फिर तो….. काम ही खत्म! स्वयं ब्रह्मा भी आकर बोले कि बेटा ये तेरे भाग्य में लिखा ही नहीं मैने… फिर भी दिन रात महादेव के चरणों में लोटते रहेंगे…. कि बाबा बस अब आप ही है। भक्ति के फील्ड में भी पैरवी….धन्य है प्रभु!</em></p><p><em>“अमर बाबू! ये जो कलक्टरई का सपना पाले बनारस आए हैं ना…फुर्र हो जाएगा। संभलिए जरा।”</em></p><p><em>“अरे का हुआ? काहे अमर बाबू को लताड़ रहे हैं गुरु? सब ठीक है, ये तुमसे काफ़ी समझदार है? क्यों अमर बाबू?”</em></p><p><em>अमर की मुस्कुराहट और जबरदस्ती थोपी गई चुप्पी ये बता रही थी कि बात अब काफी दूर निकल पड़ी थी और अब उसने महादेव के चरणों में लोटने का प्रण कर लिया था।</em></p><p><em>****</em></p><p><em>“कोई जल्दी है?”</em></p><p><em>“नहीं!”</em></p><p><em>“इतने तेज भागे चल रहे हैं। हमने सोचा कहीं कोई बहुत जरूरी काम होगा। बता दिए होते, किसी और दिन अस्सी आने का प्लान कर लेते।”</em></p><p><em>अमर झेंप सा गया। उसने धीरे-धीरे अपनी चाल धीमी की और बड़ी सावधानी से कि कहीं फिर से आगे ना निकल जाए, बिन्नू के साथ घाट की तरफ़ बढ़ने लगा।</em></p><p><em>बिन्नू की आँखें कभी अमर तो कभी दूर क्षितिज पर निकल रहे सूरज पर ठहर जाती। उसके छोटे से हृदय में एक नन्हा सुषुप्त फूल करवटें बदलने लगा था। कभी वजह, तो कभी बिना वजह लगातार हंस रही बिन्नू की खिलखिलाहट दूर मंदिरों में बज रहे घंटियों के बीच छिपती उभरती रही। अमर बिना पलक झपकाए, सुर्ख लाल किरणों में कुछ और ज़्यादा खिल रहे बिन्नू के गोल, बेइंतहा खूबसूरत चेहरे को चुपचाप देखता रहा। उसके पूरे बदन में एक सिहरन सी दौड़ गई, गंगा की लहरों कि तरह आंसू उसकी आंखों के किनारों को छूकर वापस लौट गए। ये अनुभव ईश्वरीय था।</em></p><p>****</p><p>“कुछ खाया? उफ्फ! स्वेटर भी नहीं पहना। और कितने दुबले हो गए हो!”</p><p>आस-पास कौतूहल से देख रहे लोगों कि परवाह किए बिना, प्लेटफॉर्म पर अमर के उतरते ही, बिन्नू ने सवालों की झड़ी लगा दी। इससे पहले कि अमर कुछ जवाब दे पाता, बिन्नू बेजार रोने लगी।</p><p>अमर ने बिन्नू का हाथ जोर से अपनी ओर खींचा और अपने क़रीब लाकर अपनी बाहों में भींचते हुए बोलने कि कोशिश की कि, “सब ठीक ………!” आखिरी के कुछ शब्द उसकी टूटती हुई सांस में गुम हो गए थे।</p><p>फ़लक में टूट रहे एक तारे को देख बिन्नू ने भी अपनी आँखें बंद कर ली। उसके गोल चेहरे पर चांदी सी कुछ बूंदे गिर आईं थी।</p><p>****</p><p>“इस बार नौकरी लग जाती तो कितना अच्छा होता! अब तो सब भोले बाबा के हाथ में है।”, अम्मा के इस वाक्य को सैकड़ों बार सुन चुका अमर अब नौकरी, और परिणामों की बात आते ही असहज हो उठता था।</p><p>उसका कलेजा सुन्न पड़ जाता। यह आंतरिक उद्वेग कि परिवार के सारे दुखों और तमाम काल्पनिक सुखों के बीच की दीवार उसका सफल होना ही है, उसके लहू की गति को शिथिल बनाने के लिए काफी थी।</p><p>कॉलेज के बाद के कुछ दिनों तक तो अमर के बाबूजी नौकरी के लिए दी जाने वाली परीक्षाओं और परिणामों को लेकर बेहद उत्सुक रहते थे। पर उनकी उत्सुकता अमर के निरंतर असफलताओं के बाद प्रार्थना और फ़िर बाद में एक शांत निराशा में तब्दील होती जा रही थी।</p><p>अमर के कहीं जाने की बात सुनकर उनके आंखों में सुलग उठती चमक इस बात की गवाही देती कि विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने बेटे में उनका विश्वास अब भी अटूट बना हुआ था।</p><p>स्टेशन पर छोड़ने के बाद उन्होंने अमर से सिर्फ दो टूक पूछा, “कब तक वापस आओगे!” इससे पहले अमन कुछ कहता वो फिर से बोल पड़े, “ध्यान रखना! तुम्हारा खुश रहना ज्यादा जरूरी है हमारे लिए। एग्जाम वगैरह तो अपने अपने नसीब की बात है!”</p><p>***</p><p>कालचक्र का पहिया एक ऐसे मोड़ पर आ रुका था जिसमें दोनों को अलग अलग रास्ते चुनने थे। आगे की पढ़ाई के लिए बिन्नू आज रात दिल्ली जा रही थी। वहीं अमर अपने गांव में ही रहकर सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाला था।</p><p>बिन्नू के लाए हुए टिफिन से पराठे का आखिरी टुकड़ा तोड़कर चुपचाप और बिल्कुल धीरे निगलते हुए अमर की नज़र उसके के चेहरे पर रुक गई। व्याकुल पर शांत, शाश्वत और निश्चल प्रेम में सराबोर चेहरा। जीवन से भरी हुई बिन्नू की शीतल आँखें जो कुछ ही देर पहले छलक आई थीं, उसे संबल दे रही थीं। उन्हें एकटक निहारते अमर को ये अनुभव हुआ कि अब सच में सबकुछ ठीक हो जाएगा।</p><p>(क्रमशः)</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#27 आत्मानुभूति</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-27</link>
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      <pubDate>Fri, 04 Jul 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>स्वयं से संवाद</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>“क्या कभी नंगे पांव जमीं पर पैर रख महसूस किया है?तलवों को भेदती बिजली सी एक लहरजो रीढ़ से होते हुए मस्तिष्क तक जा पहुंचती है।“बारिश में भींगते हुए सोचा है? कितना अद्भुत होता होगा, बूंद की तरह आसमान से उतरके धरती के अंतःकरण में धीमे धीमे सिमट जाना ।“हरी घास देख हो सकता है तुम्हारा</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p><em>“क्या कभी नंगे पांव जमीं पर पैर रख महसूस किया है?</em></p><p><em>तलवों को भेदती बिजली सी एक लहर</em></p><p><em>जो रीढ़ से होते हुए मस्तिष्क तक जा पहुंचती है।</em></p><p><em>“बारिश में भींगते हुए सोचा है? कितना अद्भुत होता होगा, बूंद की तरह आसमान से उतरके धरती के अंतःकरण में धीमे धीमे सिमट जाना ।</em></p><p><em>“हरी घास देख हो सकता है तुम्हारा हृदय भी छलांगे मारता हो, एक छोटे सफेद खरगोश की तरह।</em></p><p><em>“आंखे बंद करके क्या तुमने उड़ान भरी है?</em></p><p><em>“सपने में ही सही परंतु कभी तो हिमालय की सर्द हवा से तुम्हारे शरीर में सिहरन आई होगी।”</em></p><p>यदि नहीं, तो हो सकता है तुमने अपूर्णता में ही अपनी सारी चेतना व्यर्थ कर रखी हो और उलझा रखा हो स्वयं को अधूरी लालसाओं के बीच। और पूर्णता और मीठे पानी के झरने जैसा बहता वो परम सुख का मार्ग तुमने अपनी अज्ञानता की वजह से छोड़ दिया हो।</p><p>हो सकता है तुम्हें ठोकर लगी हो और तुमने पीड़ा के भय से अपना मार्ग, अपनी शक्ति अपनी पूरी ऊर्जा केवल और केवल दुखों से बचने के लिए और अपनी सुरक्षा के लिए लगा रखी हो। और इस क्रम में तुम्हें स्वार्थी, मतलबी और क्रूर बनने से भी गुरेज नहीं।</p><p>कभी समय मिले तो आंखे बंद करके स्वयं के साथ बैठो और ये सोचो कि तुम पिघल रहे हो, तुम्हारी चेतना तुम्हारे शरीर तक सीमित नहीं बल्कि तुम्हारी कल्पना के साथ साथ अनंत तक फैलती जा रही है। एक साथ सैंकड़ों सूर्य तुम्हारे ऊपर चमक रहे हैं। प्रारंभ में तुम्हारी अपूर्णता तुमसे लड़ेगी और तुम्हें बेचैन कर देगी क्योंकि ऐसा अनुभव तुमने अभी तक नहीं किया। परंतु तुम उससे लड़ना मत। उससे उलझना मत। इस क्रिया को कुछ समय कर लो तो तुम्हें लगने लगेगा कि जो तुमने ध्यान में महसूस किया था वो महज एक कल्पना जनित अनुभव नहीं बल्कि कुछ सत्य सा है। और थोड़े समय के लिए ही सही लेकिन तुमने पूर्णता को चख लिया है।</p><p>यही स्वाद तुम्हे बार बार ध्यान की ओर ले जायेगा। जिस दिन तुम्हे दूसरों में भी स्वयं दिखाई देने लगे और बिना प्रयत्न के दूसरों का अंतर्द्वंद्व तुम समझने लगे तब समझना तुमने मनुष्यता को पा लिया है। प्रेम और करुणा से तुम्हारा हृदय हमेशा भरा रहेगा और तुम पूर्णता और मीठे पानी के झरने जैसा बहता वो परम सुख का मार्ग पा लोगे।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#26 कूट-नीति</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-26</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-26</guid>
      <pubDate>Thu, 03 Jul 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>व्यंग्य</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>नेताजी जबसे दिल्‍ली से घर आए कुछ निराश से थे, उन्‍हें मायूस देख अगल बगल के दरबारियों में भी उदासी छा गई। पंद्रह वर्षों से सांसद रहते हुए भले ही नेताजी ने एक सड़क तक न बनवाई हो लेकिन उनके इर्द-गिर्द एक लघु उद्योग जरूर पनप गया था। माननीय नेताजी के ‘इमेज बिल्डिंग’ के लिए आमतौर पर जो</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>नेताजी जबसे दिल्‍ली से घर आए कुछ निराश से थे, उन्‍हें मायूस देख अगल बगल के दरबारियों में भी उदासी छा गई। पंद्रह वर्षों से सांसद रहते हुए भले ही नेताजी ने एक सड़क तक न बनवाई हो लेकिन उनके इर्द-गिर्द एक लघु उद्योग जरूर पनप गया था। माननीय नेताजी के ‘इमेज बिल्डिंग’ के लिए आमतौर पर जो कार्यक्रम होते, उसी में इन परजीवियों का निर्वहन भी शामिल था। प्रत्‍यक्ष पूछने पर किसी गंभीर प्रतिक्रिया की आशंका से सबने चुप रहना ही मुनासिब समझा।</p><p>दो-तीन दिनों बाद नेताजी अपने कार्यालय आए और गरजे, ‘‘निकम्मे हो सालों !” इन तीन जादुई शब्दों को सुनते ही दरबारियों ने कुछ राहत की सांस ली कि शायद पूरी बात पता चले। “सब के सब निकम्मे हो” नेताजी ने बोलना शुरू किया। “सदन में कितनी बेइज्जती हुई हमारी, कुछ पता भी है तुम्हें? पड़ोस के जिले का सांसद दस साल छोटा है हमसे और पता है कितने केस हैं उसपे? चालीस, और वो पार्टी अध्यक्ष जिसे हमीं राजनीति में लेकर आए जो पॉलिटिक्स इज नॉट फॉर मी, इट्स टू मेसी कहता रहता था, तीन साल में पंद्रह केस।”</p><p>हुआ यह था कि सदन में मजाक में किसी ने नेताजी को यह कह दिया कि अरे ये कैसे मंत्री बनेंगे ये तो साफ सुथरे छवि वाले हैं और यह सुनकर वहां मौजूद अन्य सांसद भी जोरों से हंस पड़े। माननीय के अंदर इतनी शक्ति तो थी नहीं की सबको मुंह पर कड़ा जवाब देते लिहाजा एक जबरदस्ती मुस्कान चिपकाए सदन से निकल पड़े और सीधा घर आके रुके। रास्ते भर उनके कान में “अरे ये तो साफ सुथरे छवि वाले हैं” और वो लकड़बग्घों वाली हंसी उनके कानों में गूंजती रही।</p><p>दरबारियों को कोसते हुए नेताजी बोले, “ सदन में किसी से कंधा भी टकराए तो वो हिस्ट्रीशीटर निकलता है और हम पर एक भी केस नहीं। शर्म से किसी से नजर नहीं मिला पाते।”</p><p>“लेकिन एक केस है ना सर” किसी ने दबी जबान में कहा। नेताजी ने देखा तो वो पार्टी के एक पुराने कार्यकर्ता थे जो अब दरबारी थे । नेताजी ने धीरे से खांस कर उन्हें चुप रहने का संकेत दिया लेकिन वो रुके नहीं और बोले, “वो सिनेमा हॉल वाला केस है ना सर!” नेताजी को जब लगा कि बात शायद खुल जाएगी तब जोर से बोले, “अरे! वो छोटा मोटा केस है।” “अरे! उससे नहीं होगा।”</p><p>किसी केस की संभावना सुन के दरबारियों की टोली उत्साहित हो उठी। अचानक मिले महत्व से कार्यकर्ता महोदय में भी एक शक्ति सी आई और एक ही सांस में विस्तार से सारी बात उगल बैठे।</p><p>***</p><p><em>फरवरी का महीना ख़त्म होने को है, हल्की गुलाबी ठंड है। इंटरमीडिएट के परिणाम आए एक हफ्ते ही हुए हैं, अपेक्षा के अनुरूप युवा नेताजी सभी पर्चों में फेल हो गए हैं और मारे मारे फिर रहे हैं। इस विपदा को भुलाने के लिए मित्रमंडली में पिक्चर देखने की योजना बनती है। सभी सिनेमा हॉल जाते हैं।</em></p><p><em>फ़िल्म देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी है टिकट के दाम बढ़ गए हैं, लेकिन युवा नेताजी के पैसे नही हैं। अचानक उन्हें सूट बूट पहना हुआ एक व्यक्ति दिखता है, जो पहनावे से अमीर जान पड़ता है। युवा नेताजी का हाथ बरबस ही उसके बटुए पर चला जाता है; लेकिन ये खुशी लंबे समय तक नहीं रहती। अचानक ही वक्त बदलता है, जज्बात बदलती है ,भीड़ बेकाबू हो चुकी है, फ़िल्म से सबका ध्यान हट सा गया है। युवा नेताजी कूटे जा रहे हैं।</em></p><p><em>उनपर “पॉकेटमारी” की धारा लगती है। लेकिन किन्हीं कारणों से केस आगे नहीं बढ़ पता</em></p><p>कहानी ख़त्म होते ही नेताजी को लगा कि अब बनी बनाई इज्ज़त भी मिट्टी में मिल गई। सिर झुकाए पुराने जख्मों को याद कर ही रहे थे कि तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई दी, दरबारियों की आंखों में आंसू थे।</p><p>नेताजी को कुछ देर तक समझ ही नहीं आया कि ये उनका अपमान हो रहा या कुछ और। उनकी आशंका तब दूर हुई जब कार्यकर्ता महोदय बोले, “ यहीं तो हमारे पार्टी की मूल विचारधारा है, उस दिन जो आपने किया वो महज एक जेबकतरिकरण नहीं बल्कि पूंजीवादी ताकतों पर एक अबोध युवा का पहला प्रहार था। आज समूचा देश अर्थ के अनर्थों को झेल रहा है, जब तक हर युवा आपके रास्तों पर नहीं चलेगा तब तक समाजवाद नहीं आयेगा।”</p><p>ताली एक बार फिर बज पड़ी।</p><p>भावुक नेताजी ने मन ही मन मंत्री पद की आशा लिए जिले के एसपी को फोन लगाया और बंद हो चुके केस को खुलवाने को कहा।</p><p>***</p><p>कुछ महीने बीते। एक दिन नेताजी कार्यालय से बाहर निकल ही रहे थे कि उनका पीए दौड़ता हुआ आया और बोला, “सर! दिल्ली से मेल आया है, कल ही निकलना होगा, आपको भ्रष्टाचार निरोध कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया है।” नेताजी को सदन वाली बात एक बार फिर याद आ गई, चेहरे पर गर्व और मुस्कान एक साथ लिए गाड़ी की तरफ़ बढ़ पड़े।</p><hr><p>(Disclaimer: This satirical piece is a work of fiction and intended for creative imagination only. Any resemblance to real persons, living or dead, or actual events is purely coincidental. The author unequivocally condemns the criminalization of politics in any form.)</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#25 पिकनिक</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-25</link>
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      <pubDate>Wed, 02 Jul 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>व्यंग्य</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>गली में हींग या कोई जड़ी-बूटी बेच रहा एक इंसानों जैसा ही कोई प्राणी जोर-जोर से कुछ चिल्ला रहा था। धंसे गाल और काकरूपी टांगे होते हुए भी उसमें इतनी ऊर्जा पता नहीं कहां से आ रही थी। उसके अलावा किसी को यह पता नहीं चलता की वो बेच क्या रहा है। कोई नगर अथवा महानगर होता तो लोग नजरंदाज क</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>गली में हींग या कोई जड़ी-बूटी बेच रहा एक इंसानों जैसा ही कोई प्राणी जोर-जोर से कुछ चिल्ला रहा था। धंसे गाल और काकरूपी टांगे होते हुए भी उसमें इतनी ऊर्जा पता नहीं कहां से आ रही थी। उसके अलावा किसी को यह पता नहीं चलता की वो बेच क्या रहा है। कोई नगर अथवा महानगर होता तो लोग नजरंदाज कर देते, लेकिन गांव के किसी गंजहे ने समय की परवाह किए बिना फुरसत से ज्ञान देना शुरू किया कि बेटा पहले अपना शरीर बनाओ, कसरत करो, बादाम मुनक्के खाओ फिर हींग वींग बेचना। ज्ञान देना उसका और उसके जैसे गांव के कइयों का मुख्य कार्य था। सब खाली समय में थोड़ी बहुत तस्करी भी कर लिया करते थे।</p><p>खुफिया विभाग के अफसरों को जब ये पता लगा कि देशभर में फैले गांजे का कारोबार का कनेक्शन उत्तर बिहार के किसी गांव से है तो उन्होंने अपने सबसे काबिल एजेंट को जासूसी के लिए भेजा। छद्मवेश में हींगवाला बने एजेंट ने पहले तो उस गंजहे की तबियत से मरम्मत की फिर ऐसे ही गांव के फक्कड़पन से प्रभावित होकर सरकारी दस्तावेजों में इस गांव का नाम बदलकर फुरसतपुर करा दिया।</p><p>काफी बरस बीते। कहते हैं नाम का बड़ा असर होता है। दुनिया जितनी तेजी से आगे बढ़ी, फुरसतपुर के लोग उतने ही धीमे होते गए। एक बार साल के आखिरी दिनों में सूरज भी अलसाया हुआ था। कभी कभार अगर थोड़ी धूप भी होती तो उसे बुड्ढे खाकर खत्म कर देते, कुर्सियों और खाटों पर पड़े-पड़े जाड़े की धूप की दिशा में खिसकते जाते लेकिन शाम होते फिर वापस घर लौट आते। बच्चे सुबह उठते, शोर करते, पिटते और फिर सो जाते । उन्ही दिनों बंटी की मन में यह इच्छा जगी कि इस साल फर्स्ट जनवरी मनाई जाए। बंटी के बार-बार कहने और नए साल की खुशी में मनोज और अन्य बच्चों ने उसका साथ देना सही समझा। पिकनिक के लिए गांव से पूरब एक बगीचे को चुना गया। चूंकि बगीचे का इस्तेमाल तपस्वियों द्वारा वेदनानाशक वनस्पतियों के सेवन हेतु भी किया जाता था, इसलिए यहां हर मौसम अखंड ज्योति जलती रहती। ईंधन के लिए पुआल भी भारी मात्रा में उपलब्ध था।</p><p>एक दर्जन अंडे ‘उठाए’ गए। उठाए इसलिए गए क्योंकि लाला मीठालाल अंडो का सौदा करने से तो नहीं हिचकिचाते थे लेकिन छूने से जरूर कतराते। धर्म के लिए वो इतना तो कर ही सकते थे। शायद इसीलिए उन्होंने हर महीने अंडो का भाव बढ़ाना भी शुरू कर दिया था। पिकनिक की बात सुन लाला का बेटा चंदन भी टोली के साथ हो लिया।</p><p>सूरज डूब चुका था। आगे का कार्य तेजी से बढ़ा। अखंड ज्योति से आग निकालकर ईंट से बने अस्थाई चूल्हे के मुंह में दी गई और पुआल की आपूर्ति जारी रहे इसका जिम्मा चंदन को दिया गया। पाकविज्ञान के नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए जो पहले हाथ आया उसे कड़ाही में फेंकना शुरू कर दिया गया। सबने कुछ न कुछ जरूर फेंका। किसी ने मसाले फेंके तो किसी ने हल्दी डाली। सर्द मौसम में चूंकि पुआल की आंच काफ़ी धीमी थी, खाना बनने में विलंब होना तय था। फुरसतपुर के परंपरानुसार, समय की भरपाई के लिए बाकी बच्चों ने बगीचे के दूसरे छोर पर आग जला ली, चारो तरफ बैठ के थोड़ी देर उछले फिर ऊंघने लगे। उधर चंदन अकेले चूल्हे में ईंधन झोंकते रहे। एक पहर बीता, खाने की बारी आई। चूल्हे के पास बैठे-बैठे चंदन शायद थक गए थे, थोड़ी दूर जाकर टहलने लगे। अंधेरे में उनकी परछाई पिशाचों को भी हनुमान चालीसा पढ़ने पर मजबूर करने वाली थी। करती भी क्यों नहीं?</p><p><em>यथा नाम, तथा गुण। नाम था चंदन, थे भी बिल्कुल लकड़ी। आप चलते तो हवाएं रुख बदलती। कुत्ते आपके पैरों को खंभा समझ मूत्रदान करते। बंदर आपको इंसान मानते और इंसान आपको बंदर। हाईस्कूल में आपको गुरुजनों का विशेष स्नेह प्राप्त था। इतिहास के मास्टर आपकी काया को मानव विकास के चरण समझाने के लिए इस्तेमाल करते और जीवविज्ञान की मैडम आपके तैंतीसो कशेरुक ऐसे प्रेमभाव से गिनतीं जैसे आपके अंदर ही तैंतीस कोटि देवों का वास हो।</em></p><p>अचानक जोर से कुछ आवाज आई। फिर कुत्ते जैसी एक मिमियाने की आवाज भी सुनाई दी। एक मासूम बच्चे ने अनुमान लगाया कि शायद बगल के गांव लंगड़पुर में गोली चली है। लेकिन मनोज इस आवाज को अच्छी तरह से जानता था। इस आवाज को उसने सिर्फ सुना ही नहीं बल्कि पितृ कृपा से चखा भी था। उसने यह बताने में देर नहीं की कि कहीं किसी को जुतिया दिया गया है। घटना क्रम कुछ ऐसा रहा। बंटी ने चंदन को दनादन दो-चार लगा दिए थे। चंदन बगल में उकड़ू होकर बैठे हुए थे। अभी और भी लगाता पर बाकी बच्चों ने उसे रोक लिया। कड़ाही में से दर्जन भर अंडे गायब थे। चंदन सिसकते हुए इसका आरोप आग के बगल में बैठे कुत्ते पर लगाते रहे, पर बंटी ने उनकी एक न सुनी थी।</p><p>अंडे किसने खाए इसका पता आज तक नहीं चल पाया।</p><p>रात भर मशाल लिए खाने की तलाश में हुआं-हुआं करते पुरखों को भी शायद ही अंदाजा होगा कि शताब्दियों बाद उनके उत्तराधिकारी वनभोज करते और आपस में लड़ते पाए जाएंगे।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#24 सौदेबाजी</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-24</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-24</guid>
      <pubDate>Tue, 01 Jul 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>व्यथा</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>जल रहा था मैं 
और उसने 
धुएं की शिकायत की थी
मेरे बदन से फूट रही
चिंगारियों को
ढोंग कहा था

उसे
नहीं चाहिए थे
हारे हुए लोग
जलते, वक्त के
मारे हुए लोग

प्रमाण चाहिए थे उसे
बलिदानों की
भूत की और
भविष्य की

उसे चाहिए था
साफ़ सुथरा 
शिष्ट प्रेमी
जिसे मालूम हो
व्यापार के सारे नियम

मै</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>जल रहा था मैं <br>
और उसने <br>
धुएं की शिकायत की थी<br>
मेरे बदन से फूट रही<br>
चिंगारियों को<br>
ढोंग कहा था<br>
<br>
उसे<br>
नहीं चाहिए थे<br>
हारे हुए लोग<br>
जलते, वक्त के<br>
मारे हुए लोग<br>
<br>
प्रमाण चाहिए थे उसे<br>
बलिदानों की<br>
भूत की और<br>
भविष्य की<br>
<br>
उसे चाहिए था<br>
साफ़ सुथरा <br>
शिष्ट प्रेमी<br>
जिसे मालूम हो<br>
व्यापार के सारे नियम<br>
<br>
मैं मूरख प्रेमी<br>
मेरी कोई चाह न थी<br>
प्रेम शब्द का ज़िक्र भी नहीं किया कभी<br>
वर्तमान में ही डूबा हुआ<br>
ढूंढ रहा था ईश्वर, उससे होकर सब में।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#23 सब कुछ अपना</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-23</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-23</guid>
      <pubDate>Tue, 24 Jun 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>कविता</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>लक्ष्य निकट
पर मार्ग कठिन हो
क्षितिज दिखे पर सूर्य मलिन हो

मन की शक्ति जब भी तेरी
थोड़ी धुंधली होने आए
उम्मीदों की ज्वाला को
संशय का अंधियारा खाए

थोड़ी आग बचा रखना तुम
धीमे सही मगर तपना तुम
जो खोया उसका क्या रोना
व्यर्थ ही है सपने ढोना 

कोई सपना ना होना
हर सपना अपना होना है
कु</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>लक्ष्य निकट<br>
पर मार्ग कठिन हो<br>
क्षितिज दिखे पर सूर्य मलिन हो<br>
<br>
मन की शक्ति जब भी तेरी<br>
थोड़ी धुंधली होने आए<br>
उम्मीदों की ज्वाला को<br>
संशय का अंधियारा खाए<br>
<br>
थोड़ी आग बचा रखना तुम<br>
धीमे सही मगर तपना तुम<br>
जो खोया उसका क्या रोना<br>
व्यर्थ ही है सपने ढोना <br>
<br>
कोई सपना ना होना<br>
हर सपना अपना होना है<br>
कुछ भी अपना ना होना<br>
शायद सब कुछ अपना होना है<br>
<br>
भला हुआ जो सपने टूटे<br>
घर बिछड़ा और अपने छूटे <br>
रजवासों के बीच भला कब<br>
मानुष 'राम' बना करता है।<br>
जो फिरता, वहीं तिरा करता है।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#22 अनायास (collection)</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-22--collection</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-22--collection</guid>
      <pubDate>Sun, 22 Jun 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>कविताओं पर कुछ प्रयोग (updated till 28/03/2026)</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>&quot;तेरे वुस&#x27;अत-ए-करम के किस्से किससे कहें हम
फिर इक बार पहली सी मुहब्बत किससे करें हम
तेरे साथ, शहंशाह था मैं अपनी मुकद्दर का
अब इन दुश्वार लम्हों की शिकायत किससे करें हम&quot;बीत गई वो रात कुछ और थी
उनसे मिली सौगात कुछ और थी
इश्क या क़फ़स के हिज्जे मुझे नहीं मालूम
पर वो पहलू में थे तो बा</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>"तेरे वुस'अत-ए-करम के किस्से किससे कहें हम<br>
फिर इक बार पहली सी मुहब्बत किससे करें हम<br>
तेरे साथ, शहंशाह था मैं अपनी मुकद्दर का<br>
अब इन दुश्वार लम्हों की शिकायत किससे करें हम</p><hr><p>"बीत गई वो रात कुछ और थी<br>
उनसे मिली सौगात कुछ और थी<br>
इश्क या क़फ़स के हिज्जे मुझे नहीं मालूम<br>
पर वो पहलू में थे तो बात कुछ और थी"</p><hr><p>"ये हसीं वहम वो भी कही बेचैन होंगे<br>
 चांद होगा फिर भी फीके नैन होंगे<br>
 मेरा पागल दिल हमेशा सोचता था<br>
 क्या करेगा जब ये उनसे दूर होगा<br>
 दूर रहकर भी मुसलसल जी रहा है।<br>
<br>
"सोचता था वक्त कितना तंग होगा <br>
क्या करेगा जब ना कोई संग होगा <br>
भीड़ में किसको ये ढूंढेंगी निगाहें <br>
सूनी पड़ जाएंगी ये कमबख्त बाहें<br>
<br>
मेरा पागल दिल हमेशा सोचता था<br>
क्या करेगा जब कभी तन्हा पड़ेगा<br>
तन्हा होकर भी मुसलसल जी रहा है।</p><hr><p>दफ्न है सैंकड़ों रुबा'इयाँ मुझमें<br>
छुप गईं इस भीड़ में तनहाइयां मुझमें<br>
लोग कहते हैं मैं झूठा हूं फरेबी हूं<br>
छू लिया क्या अपनी ही परछाइयां मुझमें<br>
<br>
चाहते हो फिर तराशूं नज़्म कोई बेरहम!<br>
क्या लूट लोगे जो बची अंगड़ाइयां मुझमें<br>
दिल्लगी है दिल्लगी को दिल्लगी का नाम दो<br>
मत करो रौशन चराग़-ए-आशनाईयां मुझमें</p><hr><p>आज सुबह एक अजीब घटना हुई<br>
अचानक ये महसूस हुआ कि<br>
मैं बहुत खुश हूं <br>
सुख की तृष्णा<br>
पूरी हो गई थी<br>
अजीब इसलिए कि कोई वजह न थी<br>
फिर भी खुश था<br>
<br>
कभी तो मैं बहुत खुश होता हूं <br>
पर ना जाने क्या मायाजाल है<br>
लोगों को दुखी दिखता हूं<br>
मेरी तमाम दलीलें<br>
धरी रह जाती हैं जब<br>
लोग बोल उठते हैं<br>
नहीं! तुम्हें पता नहीं पर तुम दुखी हो <br>
<br>
सुख दुख के इस प्रपंच से दूर<br>
अब मैने इसका मूल्यांकन <br>
करना ही बंद कर दिया है<br>
और रुक गया हूं<br>
सुख दुख के रेखा पर हो शून्य<br>
या पूर्ण?</p><hr><p>भूल गए जब एक दावानल ने <br>
तुम्हे आधा जला के छोड़ दिया था<br>
और तुमने कसम खाई थी की<br>
एक आग बचा के रखूंगा<br>
<br>
क्या दब गई वो क्रांति<br>
तुम्हारे मखमली बिस्तर तले <br>
क्या मांसल गंध में तुम्हारे <br>
नथुने गल गए हैं<br>
<br>
नशे में अक्सर अपनी<br>
मौजूदगी गुम हो जाती है<br>
और जब कभी भी<br>
ये उन्माद उतरता है<br>
घोर विरक्ति आती है<br>
<br>
छोड़ दो ये विकृत इच्छाएं<br>
जिनके पूरे होने के बाद भी<br>
तुम पूरे नहीं हो पाते <br>
कोशिश करो<br>
तुम्हारी कमियां गुजर जाएं<br>
तुम्हारे गुजरने से पहले।</p><p>People are wonderful, <br>
Incapable of not caring. <br>
Even if they mask, <br>
Even if they hide <br>
Behind empty faces.<br>
<br>
People are amazing, <br>
For they shine <br>
Even in the darkest hours, <br>
To assure others <br>
That all is not lost, <br>
That there is still hope.<br>
<br>
People are awesome, <br>
Because they dream, <br>
Because they try <br>
To make a better tomorrow, <br>
If not for the world, <br>
At least for themselves.<br>
<br>
People are great, <br>
For they make mistakes, <br>
For they learn, <br>
For they are <br>
Complete in their own existence</p><hr><p>दिन गुजरते गए <br>
और कितने मौसम बीते <br>
पर जिस हृदय के <br>
तार तूने छेड़े थे <br>
वहां एक गीत धीमे सही <br>
पर अभी भी बज रहा है।<br>
<br>
जब भी <br>
तेरी गली से गुजरता हूं <br>
सांस टूटने लगती है <br>
सिर्फ ये सोच के कि <br>
अपने नए बगीचे में तू <br>
शायद मुझे भूल गया होगा<br>
<br>
स्मृतियों से मिट जाना <br>
बड़ी सजा है <br>
मृत्यदंड से भी कठोर।</p><hr><p>अचानक ही धधक उठती है<br>
उनसे मिलने की ख्वाहिश<br>
पर ये दूरी और बेवफाई<br>
दिल को राख बना देती है<br>
<br>
कोई कहे कि उनकी आंखों में<br>
दिखता है एक कतरा भी सूनापन<br>
थोड़ा और जलके<br>
काजल ना बन जाऊं मैं</p><hr><p>नयन कमल का पट खुला<br>
और कैसा ये आकाश दिखा<br>
थर थर्राते रजत मेघ पर,<br>
प्रक्षेपित स्वर्णिम पाश दिखा ।<br>
<br>
उर्ध्वलोक में प्रतिक्षण होता,<br>
कैसा आज समर है?<br>
जलधर की प्रतिच्छाया में,<br>
तंद्रा लस दिनकर है ।<br>
<br>
धरणी का हर श्वसन नाद,<br>
भव का प्राणाधार हुआ।<br>
शक्ति शून्य में स्थिर अविचल,<br>
अंतःकरण तुषार हुआ ।</p><hr><p>आम के बगीचे से दूर,<br>
अकेले नीम के उस पार<br>
वो धुंए की चिमनी दिख रही है ?<br>
धरती पकती है वहां<br>
और बनते हैं महल ।<br>
<br>
वो नीम कब अकेला था<br>
था बरगद का साया और शीशम से यारी<br>
आंवले की याद उसे अब भी आ जाती<br>
डाल पर बैठी कोयल की बोली<br>
कैसे उन पथिकों के दुखड़े भुलाती ।<br>
<br>
उधर बायीं ओर<br>
खाली चाय के प्याले में छूटे हुए पत्तों से<br>
सूखे पड़े है कुएं में<br>
कुछ पत्थर, धरती और सिक्के,<br>
जो अब खोटे हो चुके हैं ।<br>
<br>
"घर नहीं ये महल है"<br>
नित सुन इतराता<br>
वो रौबदार मूंछो वाला आदमी बोला,<br>
"काट दो वो नीम भी-<br>
अकेले खड़ा आंख में चुभता सा है"।</p><hr><p>अध-जागी धरा के शिराओं में<br>
जीवन ने भी करवट ली<br>
<br>
वो शायद भूल गया<br>
आसमान में रात वाली<br>
बल्ब बंद करना<br>
<br>
रात का सोना पिघल<br>
लुढ़क रहा और जमने लगा<br>
सबमें<br>
<br>
सब तितर-बितर हुए<br>
ठीक वैसे, जैसे मधुमक्खियां<br>
भागती हैं आग की लपटों से<br>
<br>
वंदन कर, कर जोड़<br>
हे मानस!<br>
सूरज निकल रहा है।</p><hr><p>ऐसे ही एक दिन धूप में बैठे हुए<br>
याद आए तुम<br>
<br>
हल्की लकीर खिंच गई चेहरे पर<br>
हंसी की या शिकायत की<br>
पता नहीं<br>
<br>
तुझसे की गई हर बात गूंजती रही<br>
और खुरचती रही कलेजे को<br>
<br>
फिर याद आया<br>
क्या फर्क पड़ता है?<br>
ऐसे ही दबे पड़े हैं वक्त की गिरफ्त में<br>
अनगिनत रिश्ते<br>
जिनका कोई नाम नहीं<br>
<br>
समय की चादर ओढ़<br>
गुम हो जाना ही बेहतर है ।</p><hr><hr><p>ख़ुद से कुछ अनधीन हुए<br>
सपने भी रंगीन हुए<br>
फागुन की थपकी से सारे<br>
शिकवे गिले ज़मीन हुए।<br>
<br>
उग आई रंगो की फ़सल कोई<br>
जमीं पर, और पकने लगी।<br>
किसी मधुबन से आती<br>
फिसलती, बहकती<br>
हवा भी महकने लगी।<br>
<br>
आओ थोड़े रंग खिलाएं<br>
संग जरा सा भंग मिलाएं<br>
रंगोत्सव के चिर उमंग में<br>
आज, अनंत तक नाचे गाएं।</p><hr><p>"धीमे-धीमे सुलगने दो<br>
मगर आग न लगने दो<br>
<br>
"दिल अगर<br>
भींगता है, भींगने दो<br>
रंग चढ़ा? छूट जाएगा<br>
पर दाग न लगने दो<br>
देखो! आग न लगने दो<br>
<br>
"ये आशिक़ी बड़ी बेगैरत चीज है,<br>
बदनाम हो जाओगे!!<br>
फेर लो गर आंखें मिलें<br>
मरज-ए-इश्क न जगने दो<br>
सुनो! आग न लगने दो"<br>
***<br>
<br>
<br>
"आग से डरोगे तो<br>
क्या ख़ाक इश्क करोगे?<br>
धीमे-धीमे सुलग के<br>
तिल-तिल मरोगे<br>
<br>
<br>
"रंग में रंगना किसी के<br>
कोई उक़ूबत नही दोस्त!<br>
निगाहें मिलेंगी<br>
तब जाकर समझोगे"</p><hr><p>मुख पर आभा दीप्त,<br>
चढ्यो अति शुभ रंग<br>
चिर अनंत सुख काल रहे,<br>
हर क्षण रहे उमंग।<br>
<br>
धन धान्य पूरित रहे,<br>
कीर्ति बढ़े विशेष<br>
दीर्घायु हों नवयुगल,<br>
रक्षा करें महेश।</p><hr><p>रूखी गरम हवाओं<br>
ने निचोड़ लिया है<br>
बादल सारा<br>
<br>
सूनी पड़ी हैं पहाड़ियां;<br>
उनके चूनर का रंग<br>
उतरने जो लगा है।<br>
<br>
समंदर की ओर<br>
एकटक ताकती,<br>
निहारती हुईं<br>
खड़ी हैं चुपचाप।<br>
लेकिन क्यों?<br>
<br>
क्योंकि<br>
भींगने से ज्यादा<br>
भींगने की आस<br>
भिंगोती है।</p><hr><p>[कभी]<br>
मैं फिसलता <br>
बिखरता<br>
रेत की तरह<br>
वो समेटती, बांधती<br>
बिला शिकवा<br>
<br>
[कभी]<br>
एकसार होते हम दोनों<br>
वह इक मीठी प्यास<br>
खारा मैं <br>
<br>
[कभी]<br>
ईर्ष्यालु देवता<br>
न्यायाधीश लोग<br>
धधकते अंगारों की तरह<br>
टूटते बरसते <br>
<br>
[हमेशा]<br>
शीतल शाश्वत<br>
सरसता प्रेम</p><hr><p>उबलते पानी की नाचती बूंदे<br>
आंच रोकते ही पड़ <br>
जाती हैं, समतल।<br>
<br>
जैसे दिल टूटने के बाद<br>
महसूस होती है एक गहरी<br>
रिक्तता, <br>
दिखता है सब सपाट<br>
और बेरंग।<br>
<br>
जैसे लंबे ज्वर से ठीक होकर<br>
हस्पताल से घर लौटते बच्चे को<br>
लगता है सबकुछ, शांत, गतिहीन, ठंडा।<br>
<br>
इतवार की अलसाई दुपहरियों<br>
में खाली सड़कें,<br>
जैसे दुनिया की सारी <br>
घड़ियां पड़ गईं हों बंद।<br>
<br>
इस बेरंग, सपाट, गतिहीन, ठंडी<br>
रिक्तता का नाम ही<br>
जीवन है।<br>
 <br>
इसके अलावा सबकुछ<br>
इंसानी कारगुज़ारी है,<br>
शैतानी है,<br>
फांस है।</p><hr><p>उस दिन मेट्रो की <br>
सीढ़ियों पर बैठे आखिर<br>
पूछ ही लिया था मुझसे,<br>
<br>
कि ये जो हममें तुममें था<br>
वो क्या था?<br>
<br>
होंठ फड़के थे, फिर<br>
एक लंबी खामोशी के बाद मैने<br>
ये सवाल तुम्हारी ओर ही मोड़ दिया था<br>
<br>
दोनों की ही आंखों में <br>
बाहर तेज गिर रही बारिश का <br>
प्रतिबिंब उतर आया था।<br>
<br>
जैसे छोड़ आया हूं जीना वही,<br>
जैसे मेरे प्राण अटक गए हों,<br>
उन सीढ़ियों पर।<br>
जब भी उनसे गुजरता हूं,<br>
टुकड़ा टुकड़ा घटता हूं <br>
अमावस की ओर।</p><hr><p>हिमालय से आती सर्द हवा<br>
हजारों दरख़्तों से छन कर आती<br>
मुझे छलनी करने<br>
दौड़ती आती है<br>
<br>
और ये अदना अलाव<br>
मेरे सर्द रातों का इकलौता साथी<br>
अपनी पूरी अस्तित्व के साथ<br>
मेरी हिफाज़त करने को आतुर<br>
चट चट आवाज करता<br>
गीत भी गा रहा मेरे लिए।</p><hr><p>वो भी क्या दिन थे कि जब न चाह थी न प्यार था<br>
एक कम-बख़्त मैं ही था, दूजा कोई नहीं हुशियार था<br>
<br>
थे चंद लोग और चंद किस्से, न बस्ती थी न बाज़ार था <br>
खुला आसमां था ऊपर मेरे, दिल ऐसे न बेकरार था<br>
<br>
गर्मी की दुपहरी एक बदमस्त बयार गीत गाती थी<br>
गुल ही गुल थे बज़्म में, न कांटे थे न अग्यार था</p><hr><p>आसमान की छप्पर से,<br>
गुमसुम लटकता,<br>
ये तन्हा चांद,<br>
चांद तभी तक है,<br>
जब तक दूर है।<br>
पास होता—<br>
पत्थर का टुकड़ा होता।<br>
<br>
जायज़ हैं दूरियां,<br>
शायद, इसी वजह।<br>
मिलना—<br>
सबकी तक़दीर नहीं।</p><hr>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#21 ढलती शाम</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-21</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-21</guid>
      <pubDate>Fri, 20 Jun 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>आशु कविता</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>ढलती शाम 
मेरी रेलगाड़ी
किसी छोटे शहर से गुजरी
सब घर जा रहे थे
लोग बाजारों से,
बच्चे ट्यूशन से,
चिड़ियां एक गीत गाते
अपने घोंसले की ओर चल पड़ी थीं।

मैं सयाना
कुछ तलाशते
घर से दूर, बहुत दूर आ गया था।

इस बड़े शहर में,
दिन खत्म होता है अब मेरे लिए
शामें नहीं ढलती

हां! सूरज जरूर ड</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>ढलती शाम <br>
मेरी रेलगाड़ी<br>
किसी छोटे शहर से गुजरी<br>
सब घर जा रहे थे<br>
लोग बाजारों से,<br>
बच्चे ट्यूशन से,<br>
चिड़ियां एक गीत गाते<br>
अपने घोंसले की ओर चल पड़ी थीं।<br>
<br>
मैं सयाना<br>
कुछ तलाशते<br>
घर से दूर, बहुत दूर आ गया था।<br>
<br>
इस बड़े शहर में,<br>
दिन खत्म होता है अब मेरे लिए<br>
शामें नहीं ढलती<br>
<br>
हां! सूरज जरूर डूबता है.<br>
और डूबने लगता है, एक बच्चे का मन<br>
जो गांव की धूल में खेल कर थका हरा<br>
हर इक ढलती शाम घर लौट आता था।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#20 रंग बेरंग सब एक</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-20</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-20</guid>
      <pubDate>Fri, 20 Jun 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>कविता</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>भाग्य तेरा था किसी वनिता के
बालों में गूंथा जाना
या ईश्वर के श्री चरणों में
पड़ न्यौछावर हो जाना

तू बड़भागा रे ओ गुलाब!
जो उसके हिस्से आ पाया
फीके रंगों में भी देखा
उसने अपना ही तो साया

इक तितली बेरंग
कहां तक रंग किसी को दे पाती 
अलग थलग ही रही जिंदगी
नहीं रहा कोई साथी

एक रात स</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>भाग्य तेरा था किसी वनिता के<br>
बालों में गूंथा जाना<br>
या ईश्वर के श्री चरणों में<br>
पड़ न्यौछावर हो जाना<br>
<br>
तू बड़भागा रे ओ गुलाब!<br>
जो उसके हिस्से आ पाया<br>
फीके रंगों में भी देखा<br>
उसने अपना ही तो साया<br>
<br>
इक तितली बेरंग<br>
कहां तक रंग किसी को दे पाती <br>
अलग थलग ही रही जिंदगी<br>
नहीं रहा कोई साथी<br>
<br>
एक रात सबसे छुपकर<br>
मधु तलाशने आई थी<br>
सूखे पड़े थे तुम साथ में<br>
कलियां भी मुरझाई थीं<br>
<br>
कुछ कौंधा था उर में उसके<br>
सुध-बुध खो बैठी जो सारी<br>
तेरा अंत स्वीकार ना उसको<br>
संकट था ये भारी <br>
<br>
बेरंग पंखों पर समेट कर<br>
ओस की बूंदे ले आई<br>
तितली का ये प्रेम देख<br>
नभ की आँखें भी भर आईं<br>
<br>
शशि-यामिनी चुप-चाप देखते<br>
मन ही मन मुसकाते थे<br>
रंग बेरंग सब एकरंग हुए<br>
तितली-गुलाब सुख पाते थे।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#19 आंचल</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-19</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-19</guid>
      <pubDate>Sun, 11 May 2025 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>कविता</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>धूप या बेमौसम बारिश थी शायद
या फिर ऐसे ही आंचल में
जा छिपा था वो...

हल्के रेशमी धागों का वो अंबर 
सैकड़ों चांद दिखते थे जहां से
खिलखिलाता
मखमली थपकियों के बीच 
सो गया था।

छोटी गुलाबी हथेली के कपाट
में अपनी तर्जनी को क़ैद छोड़े
समूचा संसार ही दे रखा हो जैसे
मुस्कुराती मां, एकटक</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>धूप या बेमौसम बारिश थी शायद<br>
या फिर ऐसे ही आंचल में<br>
जा छिपा था वो...<br>
<br>
हल्के रेशमी धागों का वो अंबर <br>
सैकड़ों चांद दिखते थे जहां से<br>
खिलखिलाता<br>
मखमली थपकियों के बीच <br>
सो गया था।<br>
<br>
छोटी गुलाबी हथेली के कपाट<br>
में अपनी तर्जनी को क़ैद छोड़े<br>
समूचा संसार ही दे रखा हो जैसे<br>
मुस्कुराती मां, एकटक निहारती <br>
जागती रही।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#18 व्हाइट नाइट्स</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-18</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-18</guid>
      <pubDate>Fri, 04 Oct 2024 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>कविता</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>&quot;सपनो में डूबा मैं
  हकीकी दुनिया से अनजान
  मुझे समेटने दो 
  वो रुका हुआ चांद

  &quot;ये बरबस गिरते
  दरियादिल बेचारे आंसू
  मत रोको इन्हे
  इनकी चोट से कोई घायल नही होगा।

 &quot;मुझे मालूम है तुमने
  अपने विचारो में भी करुणा भर रखा है
  शायद सोचती हो मुझे वापस ले आओगी
  इस सूखे अंतर्म</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>"सपनो में डूबा मैं<br>
  हकीकी दुनिया से अनजान<br>
  मुझे समेटने दो <br>
  वो रुका हुआ चांद<br>
<br>
  "ये बरबस गिरते<br>
  दरियादिल बेचारे आंसू<br>
  मत रोको इन्हे<br>
  इनकी चोट से कोई घायल नही होगा।<br>
<br>
 "मुझे मालूम है तुमने<br>
  अपने विचारो में भी करुणा भर रखा है<br>
  शायद सोचती हो मुझे वापस ले आओगी<br>
  इस सूखे अंतर्मन के कंटीले जंगलों से<br>
<br>
 "बड़ी मासूम हो तुम<br>
  तुम्हारे सर्द हाथ और<br>
  मेरी दावानल सी धधकती आत्मा <br>
  इश्क़ में पागल मत बनो<br>
  मेरी नास्तेन्का!</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#17 खुशगवार शाम</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-17</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-17</guid>
      <pubDate>Sun, 04 Aug 2024 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>कविता</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>उठती बैठती मूक सांसे।
तेज गिरती बारिश से धुलकर,
और चटख होती,
इक धुंधली-सी याद!

होठों के नीचे एक नन्हा सा तिल।
उसकी डूबती नजरों में गोते खाता,
दुनिया में, पर दुनिया से दूर,
बेसुध,अनुरक्त और मदांध मैं।

ढलती शाम।
वापस लौटते पंछी।
रेत की तरह फिसलता दिन।
मेज पर चीखती किताबें।
इक उलझ</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>उठती बैठती मूक सांसे।<br>
तेज गिरती बारिश से धुलकर,<br>
और चटख होती,<br>
इक धुंधली-सी याद!<br>
<br>
होठों के नीचे एक नन्हा सा तिल।<br>
उसकी डूबती नजरों में गोते खाता,<br>
दुनिया में, पर दुनिया से दूर,<br>
बेसुध,अनुरक्त और मदांध मैं।<br>
<br>
ढलती शाम।<br>
वापस लौटते पंछी।<br>
रेत की तरह फिसलता दिन।<br>
मेज पर चीखती किताबें।<br>
इक उलझी, अतृप्त, असहाय प्यास।<br>
<br>
मेज पर चीखती किताबें।<br>
बाहर बुलाते अमलतास के फूल।<br>
इन सबके बीच,<br>
स्वयं को भूल जाने की चाह।<br>
खुश, तटस्थ, बेपरवाह मैं!</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#16 Trek to Tranquility</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-16-trek-to-tranquility</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-16-trek-to-tranquility</guid>
      <pubDate>Sat, 20 Jul 2024 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>Uncategorised</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>July 17th, 202404:45 PMRain was becoming harsher as if nature had decided to teach us a lesson. Lesson that fear is a necessary survival trait. We carefully huddled on the rocks with firm hands holding the umbrellas. A dissident streak of setting sun rays fell on our faces. Extin</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p><strong>July 17th, 2024</strong></p><p><strong>04:45 PM</strong></p><p>Rain was becoming harsher as if nature had decided to teach us a lesson. Lesson that fear is a necessary survival trait. We carefully huddled on the rocks with firm hands holding the umbrellas. A dissident streak of setting sun rays fell on our faces. Extinguishing the bliss and hope we had garnered so far. The only thing giving us courage was the collective trust in human evolution and the ancestral roots we often tend to forget. More than the natural factors, there was another situation sending shivers to our spines. Two of our team members had gone astray in the deep labyrinth of the Garbett trek.</p><hr><p><strong>08:55 AM</strong></p><p>A small group of us, weary from long office hours and inspired by our seniors, waited anxiously at a local Mumbai subway station for our trek to Garbett plateau, the third-highest point of the Mahabaleshwar range. After an hour and a half of travel and a few selfies we started seeing these points on the horizon. Smiles spread across all our faces and our loud cheer faded into the roaring train horn.</p><p><strong>11:15 AM</strong></p><p>The aloo parathas were still warm when we unwrapped them from old newspaper coverings. We bought enough water bottles for the journey and negotiated loose tomato sauce to savour with parathas since the shopkeeper did not have such a thing to sell. We followed a path suggested by the google maps and to everyone’s surprise, just after one or two kilometres, found a lake surrounded by lush greenery with numerous streams of water draining into it. In the distant background, adorned with feather-like clouds, the Garbett point was tempting our evolutionary traits fueling an innate desire to conquer its height.</p><p><strong>02:30 PM</strong></p><p>We had to rely on our instincts and intuition since there were no clear signs or directions pointing towards the peak. We were trekking on a weekday, and the only checkpoints were empty stalls, offering a small confirmation that we were heading in the right direction.</p><p>At one such stall, some of us stopped to buy water bottles and refreshments. It was right after this that our group got separated into three. While some of us paused to pay for the supplies, others continued ahead, likely to find the trail and way forward.</p><p>However, sudden rainfalls and zigzagging paths through villages disoriented everyone. And the steep elevation and torrential rains constantly tested our nerves.</p><p><strong>03:04 PM</strong></p><p>Gathered around a blue water tank at the end of a village, our expressions started to change. We shared our location and a video with the two guys who had mistakenly taken a different path, thanks to the constant connection on our phones. Some of us called out their names, venturing deeper into the wilderness only to find nothing. Later, it was decided that everyone would try to reach the bright yellow stall, beautifully nestled in the plateau’s lap, the only common landmark visible to both groups.</p><p><strong>03:38 PM</strong></p><p>Someone sighted two figures wearing red and blue near the top, same as our other two mates who were supposed to come from the other side. We shouted and to our extreme astonishment they responded. But this happiness lasted for only a couple of moments. My phone rang. They were not there, the figures we had just seen were some other people. In fact, both of them were retreating and trying to reach the same blue water tank where we first found about the goof up. After fifteen minutes again two figures emerged. This time it was downhill, near the blue water tank. A phone call confirmed that each and every member of the group was in sight and accounted for.</p><p><strong>05:00 PM</strong></p><p>The day was getting over, yet we had only covered half of the fourteen kilometre long trek to Garbett point. Although we had started early, the captivating, mesmerising but testing landscapes of Western Ghats made our pace slower. We lost track of time, reaching the halfway point after nearly four hours. I opened my bag and opened a box of chocolate brownie cakes. From this point, we started rationing every ounce of food we had. Then, someone suggested sending a scout party forward to see what lies ahead. Fearful of another goof up we chose to wait and regroup before continuing.</p><p><strong>05:18 PM</strong></p><p>Everyone cheered and clapped when all of us were together again after two hours of emotional turmoil. At this point only a few hours of sunshine were left and we had not even reached the top. Finding an exit route was another challenge. We accelerated our pace and later found a dead end. The only visible route was through a shrunken waterfall. Any misstep on the slippery rock was a guaranteed fall in the deep gorge. Some of us started retreating back but the others went back and found a gully-like path covered with thorns and mud. The path was leading upwards sharply, circumventing the plateau. This pebble laden path was on the extreme edge making everyone nervous. We did not look down to avoid the fear of height. Shouting Lord Shiva’s name we moved forward with caution. After a few minutes, we found Lord Ganesha’s photograph beautifully placed near the top. Then emerged a saffron flag. And there was nothing after that except for raw, fresh natural beauty. After seven hours, we were finally on top of the plateau.</p><p>It was the most wonderful view I had ever seen. We were thriving at the same altitude as the clouds. The entire area was covered with fluorescent green, soft grass. A surge of euphoria washed over us. Everyone was shouting and running, but suddenly, silence fell. It was a moment of absolute humility—a realization of the smallness of individual human existence. There was nothing but distant shades of green on the horizon, beautifully adorned with clouds. We could see the lake, but it appeared ridiculously small from such a height. The scenery of miniature waterfalls and streams made the view hypnotizing. We took group pictures.</p><p><strong>06:07 PM</strong></p><p>Up to this point, none of us knew how or when we would exit this trail. I texted someone I knew, hoping to get an idea about the exit. A few of us even considered staying there until morning, fearing the imminent sunset. My own mind kicked into survival mode, randomly suggesting ways to endure the night. My throat was parched, and I started contemplating how I would collect rainwater using upturned umbrellas.</p><p>Nearly a hundred meters ahead, one of us discovered disturbed soil, hinting at a very narrow path around the peak. We cautiously ventured into the unknown. Our courage was swiftly rewarded with a wide path marked by tire tracks. The sign of vehicle accessibility boosted our energy and propelled our pace. We continued onward; the makeshift road seemed endless. At one point, it began ascending, causing us to doubt our senses. Fallen trees, the setting sun, and an eight-hour continuous trek drained us physically and emotionally. There was no water, no food, and no clear exit. My proposed five-minute break was vetoed down to two minutes. One of us filled a bottle with water from a muddy stream, praying that he would never be in a situation where he had to use it. The prayer was answered. We heard the sound of horns—vehicles were nearby. Everyone finally felt alive. A newfound appreciation for life blossomed in our hearts.</p><p><strong>07:20 PM</strong></p><p>This absolutely amazing, terrifying trek ended on a happy note. Moments before hearing those horns, we were cluelessly wandering into uncertainty. It taught us that in every given situation there is a choice. We were frightened but we chose to be happy. We were terrified, but it did not stop us from cracking jokes. Another thing it taught us is that human salvation lies in togetherness. Though selfish behaviour serves a utilitarian purpose and elevates individual growth, individuals are not separate from society. He or she must return to it gracefully by sharing fruits of its actions, choosing kindness and serving the greater good.</p><p>Through the glass windows of the vehicle, we could see the contours of the plateau. It was standing there magnificently. Millions of years have passed since these structures were formed. It has seen all human evolutions, and will continue to do so. We will not be here forever, but it will be right there for millions of years, elegantly adorned to welcome the next generation of visitors.</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#15 अलेक्जेंड्रिया</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-15</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-15</guid>
      <pubDate>Thu, 11 Jul 2024 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>कविता</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>अलस-सुब्ह
गिरती-रुकती दुविधापूर्ण बारिश
ढीठ दिहाड़ी मजदूर
गड्ढों से बचते भागते लोग

उधर बेपरवाह थोड़ी मदमत्त 
सबको हिकारत से ताकती 
स्कूटर की मखमली सीट पर बैठी
नाखून साफ करती अलेक्जेंड्रिया
हरी कांच-सी आंखों से
सपने देख रही...

सूखी समतल दुनिया
दिन में भी पूरा चांद निकलता हो जहां</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>अलस-सुब्ह<br>
गिरती-रुकती दुविधापूर्ण बारिश<br>
ढीठ दिहाड़ी मजदूर<br>
गड्ढों से बचते भागते लोग<br>
<br>
उधर बेपरवाह थोड़ी मदमत्त <br>
सबको हिकारत से ताकती <br>
स्कूटर की मखमली सीट पर बैठी<br>
नाखून साफ करती अलेक्जेंड्रिया<br>
हरी कांच-सी आंखों से<br>
सपने देख रही...<br>
<br>
सूखी समतल दुनिया<br>
दिन में भी पूरा चांद निकलता हो जहां<br>
इक ऐसी दुनिया<br>
जिसमे सचमुच मिले उसे नौ जिंदगियां<br>
इंसान का नामोनिशान ना हों<br>
पसरे पड़े हों सिर्फ चूहे ही चूहे</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#14 आगे बढ़ता जाऊंगा</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-14</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-14</guid>
      <pubDate>Sat, 12 Aug 2023 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>कविता</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>कोई शक्ति है या छाया है
तू है यथार्थ या माया है
बतला दे मुझको हाल अभी
बन बरस न जाऊं काल अभी

देखा है मैंने, दबे पांव
तू तर्क भेष में आता है
तपोमूर्त साधक मन में
तू माहुर घोले जाता है

&quot;होगा तू भक्षक सपनों का
चल किए हैं तूने कर्म ध्वस्त
पर मेरे निश्चय के दृढ़ शिखरों
से कभी ना होगा</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>कोई शक्ति है या छाया है<br>
तू है यथार्थ या माया है<br>
बतला दे मुझको हाल अभी<br>
बन बरस न जाऊं काल अभी<br>
<br>
देखा है मैंने, दबे पांव<br>
तू तर्क भेष में आता है<br>
तपोमूर्त साधक मन में<br>
तू माहुर घोले जाता है<br>
<br>
"होगा तू भक्षक सपनों का<br>
चल किए हैं तूने कर्म ध्वस्त<br>
पर मेरे निश्चय के दृढ़ शिखरों<br>
से कभी ना होगा सूर्य अस्त<br>
<br>
तेरे कुतर्क को हो तत्पर<br>
मैं तत्क्षण आग लगाऊंगा<br>
सांसों में भरकर ओमकार<br>
मैं आगे बढ़ते जाऊंगा<br>
<br>
रुक जाना मेरी चाह नहीं<br>
संकट आए अब आह नहीं<br>
अब बजरंगी-सा हो अभीत<br>
मैं संशय लंका ढाऊंगा<br>
और आगे बढ़ता जाऊंगा।"</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#13 the first love</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-13-the-first-love</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-13-the-first-love</guid>
      <pubDate>Sun, 02 Jul 2023 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>poetry</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>&quot;long chaotic days &amp;amp; 
the harsh restless nights 
all disappear
at that one beautiful sight

&quot;those starry radiant eyes
Ohh! that wide jolly smile
I feel like human once again 
I feel like floating on the Nile

&quot;between the music of the nature 
and the silence of the heart
the</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>"long chaotic days &amp; <br>
the harsh restless nights <br>
all disappear<br>
at that one beautiful sight<br>
<br>
"those starry radiant eyes<br>
Ohh! that wide jolly smile<br>
I feel like human once again <br>
I feel like floating on the Nile<br>
<br>
"between the music of the nature <br>
and the silence of the heart<br>
there are frissons, <br>
there are storms<br>
and hopes of a new start.</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#12 A kid and a dog</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-12-a-kid-and-a-dog</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-12-a-kid-and-a-dog</guid>
      <pubDate>Tue, 11 Apr 2023 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>short story</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>When the clock counted four, the kid peeped through the window. Quite anxiously to make sure that the dog was not there. But it was certainly there. Making its presence felt through intense barks.“What’s wrong with these dogs!”“Why don’t they leave me alone?” He shouted with ange</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p><strong>W</strong>hen the clock counted four, the kid peeped through the window. Quite anxiously to make sure that the dog was not there. But it was certainly there. Making its presence felt through intense barks.</p><p><em>“What’s wrong with these dogs!”</em></p><p><em>“Why don’t they leave me alone?” </em>He shouted with anger.</p><p>It was Sunday. Which meant it was time for him to go visit the park. But the dog seemed to ruin his plans.</p><p><em>“I told you to stare in their eyes when they start barking at you.”</em>, a hollow but firm voice suggested. The voice was of his grandfather’s. But the kid didn’t make a move. Seeing his gloomy face, the grandfather sighed and decided to go with him. He lifted his cane and slowly escorted the kid away from the dog.</p><p>***</p><p>When the floodlights turned on, the kid realised that it was time for him to go home. The sun was setting very quickly. On the way, he was caught off guard when he saw the dog. Expecting the usual traumatic confrontation, the kid decided to apply his grandpa’s trick. To stare indefinitely. His legs started trembling. And breath became shorter.</p><p>To his extreme surprise, the dog did not move a hair. The kid thought, ‘Maybe it can’t see in the dark. But it was not that dark. The kid started thinking about why it was not moving. He started thumping his legs. Possibly to try the trick. Possibly to end the matter completely. Even after provoking from a distance, the kid could not entertain the dog’s attention.</p><p>Seeing the enemy dormant, the kid became more confident. He stepped a little more towards the dog. The dog was still. No movement. He carefully poked the dog with his feet and waited for a response. The dog startled and looked at him. A strange feeling made the kid shiver. He saw tears in the eyes of the dog. The dog made a feeble howl. It was trying to show something. The wounded paw. The dog’s paw was soaked in blood. Some vehicle had run over it. The kid was still trembling. The breath was still shorter. But the fear was gone. New emotions arose in his heart. Emotions of tenderness. Of affection and care.</p><p>Wrapped in his small hands, the dog was probably feeling the same. It started licking his elbow.</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#11 the laughing hearts</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-11-the-laughing-hearts</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-11-the-laughing-hearts</guid>
      <pubDate>Mon, 31 Oct 2022 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>poetry</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>&quot;no one&#x27;s more happy
than a kid
running from the store
with snacks in her little hands
dancing and giggling
waiting to devour
all bits and pieces

&quot;no one&#x27;s more happy
than a mother
bathing her child,
who is jumping like waves
giggling and struggling
for a breath through the
pour</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>"no one's more happy<br>
than a kid<br>
running from the store<br>
with snacks in her little hands<br>
dancing and giggling<br>
waiting to devour<br>
all bits and pieces<br>
<br>
"no one's more happy<br>
than a mother<br>
bathing her child,<br>
who is jumping like waves<br>
giggling and struggling<br>
for a breath through the<br>
pouring water."</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#10 कलिकाल</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-10</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-10</guid>
      <pubDate>Tue, 25 Oct 2022 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>भाग एक</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>पश्चिम में सूरज अस्ताचल पर्वत के सतहों में पिघलने लगा था। अंधेरे और बची खुची लालिमा के बीच संघर्ष से भयभीत खगों ने अब कूहना बंद कर दिया था। कुटिया के समीप गोवंशो की क्रीड़ा भी समापन की ओर अग्रसर थी। दिन की चकाचौंध से मूक हुए नर्मदा के स्वर अब फूटने लगे थे। संध्या ध्यान में बैठे म</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>पश्चिम में सूरज अस्ताचल पर्वत के सतहों में पिघलने लगा था। अंधेरे और बची खुची लालिमा के बीच संघर्ष से भयभीत खगों ने अब कूहना बंद कर दिया था। कुटिया के समीप गोवंशो की क्रीड़ा भी समापन की ओर अग्रसर थी। दिन की चकाचौंध से मूक हुए नर्मदा के स्वर अब फूटने लगे थे। संध्या ध्यान में बैठे मिलिंद ने आंखें खोल एक गहरी श्वास छोड़ी और नर्मदा के अंतहीन तट की ओर देखा। सूर्य भले ही अस्त हो चुका था परंतु उसके चेहरे का तेज देख यह प्रतीत होता था, मानो दिनकर ने ही पुरुषार्थ के सम्मान में अपना एक हिस्सा उस पर छोड़ दिया हो। उसके चेहरे पर आकृतियां अचानक बदल सी गईं जब उसने देखा कि तट के किनारे किनारे अश्वरोहियों का एक समूह इसी दिशा में चला रहा था। घोड़ों के टापों ने स्थिर पड़ी रेत को ही नहीं बल्कि वहां पसरी आभा को भी क्रूरता से रौंदना शुरू कर दिया था। किसी विघ्न की आशंका उसके हृदय में उठ खड़ी हुई, वह स्फूर्ति से कुटिया के अंदर गया। थोड़ी देर बाद वह एक अस्त्र हाथ में ले बाहर आया और पाषाणी भंगिमा में आगंतुकों की प्रतीक्षा करने लगा।</p><p>घुड़सवार नजदीक आ गए थे। उनके हाथ में पताकाएं थी। नीले चौकोर वस्त्र के टुकड़े पर बनी चंद्राकार आकृतियों से आगंतुकों के मित्रवत होने का प्रमाण मिलते ही चेहरे पर अचरज का भाव लिए मिलिंद ने जोर से उनके आने का प्रयोजन पूछा। प्रत्युत्तर में उसे बताया गया कि राजकुमारी नंदिनी उससे मिलने आईं है।</p><p>मिलिंद का हृदय जोर जोर से धड़कने लगा।</p><p>राजकुमारी! रात्रि के इस पहर। क्या कोई संकट आ पड़ा? किसी विपदा ने घेर लिया? मेरा मन स्थिर क्यों नहीं रह पा रहा? मन को शैल के समान स्थिर करने में निपुण होने के बाद भी मेरी यह दशा क्यों होती जा रही है? इससे पहले की वह कुछ और सोचता नंदिनी उसके सामने आ खड़ी हुई। वो नंदिनी के चेहरे की ओर देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।</p><p>दूसरी ओर नंदिनी के हृदय में भी एक अंतरयुद्ध चल रहा था। जहां एक तरफ मृगया से सहम के भागी हुई हिरणी की कातरता थी वहीं शिकार से पहले किसी शांत शेरनी जैसी स्थिरता उसे खूंखार बनाए जा रही थी। पुर में हुई सारी घटनाएं उसके आंखों के सामने बिजली की भांति घूम गई। बीते महीने राज्योत्सव के समय जब चक्रवर्ती सम्राट ने पुर में युद्ध कौशल की प्रतियोगिता आयोजित कराई थी तब नंदिनी को विश्वास था कि उसके सौगंध दिलाने से मिलिंद प्रतियोगिता में अवश्य ही भाग लेगा। परन्तु मिलिंद ने जिस निर्दयता से उसके हृदय की कामना को रौंदा था उसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी। जिस नंदिनी की मोहक छवि आर्यावर्त के रत्न कहे जाने वाले कवियों की प्रेरणा हुआ करती थी उसके इतने सुंदर होने का क्या लाभ यदि वो अपने प्रिय को एक छोटा कार्य करने के लिए भी ना मना सके। नंदिनी ने कभी नहीं सोचा था कि कालचक्र का पहिया ऐसी स्थिति पर आ रुकेगा और उसे एक बार फिर इस कठोर हृदय मिलिंद के सामने आने को विवश होना पड़ेगा। मिलिंद पर एकटक ध्यान लगाए वह सोचने लगी, “हाय! कैसी स्थिति कर रखी है अपनी? और वनवासियों जैसे केश भी बढ़ा लिए हैं इसने। हे शिव! मैंने मन ही मन प्रतिशोध के जितने भी यतन सोच रखे थे वो करुणा में क्यों बदल रहे हैं? पर मुझे अभी संयम रखना होगा। राज्य पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, मुझे मिलिंद से मदद मांगनी होगी।”</p><p>“पिताश्री को सेनापति काटक ने बंदी बना लिया है। राजसी षड्यंत्र के बीच मैं कुछ विश्वासी अंगरक्षकों के साथ आपके पास चली आयी। हे द्विज पुत्र, मैं आपके प्रण से भली भांति परिचित हूं। शिव की सौगंध, मेरी ये तनिक भी इच्छा नहीं थी कि मैं आपके तपस्या में विघ्न डालूं। परन्तु पितृ मोह ने मुझे यहां आने को विवश कर दिया। छल, कपट और विश्वासघात के इस वातावरण में मैंने आपके अतिरिक्त किसी अन्य का आश्रय लेना उचित नहीं समझा।”</p><p>राजकुमारी का कांपती आवाज में याचना करना मिलिंद को हृदय में शूल की भांति धंसता प्रतीत हुआ। उसने धीमे परन्तु स्पष्ट आवाज में नंदिनी से कहा, “आर्यपुत्री! आप शीघ्र ही मेरी कुटिया की ओर चलें। इस षड्यंत्र से चक्रवर्ती सम्राट को कैसे बचाना है ये मैं आपको वहीं समझाता हूं।”</p><p>(क्रमशः)</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#9 गहरी नींद</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-9</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-9</guid>
      <pubDate>Mon, 24 Oct 2022 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>story</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>किसी तेज धमाके ने मुझे जगाया। मुझे तेज ठंड लग रही थी। आंखे कुछ देर तक बोझिल ही थीं। कमरे में बहुत थोड़ी रोशनी बची थी। शायद सुबह हो गई थी। मैंने जोर से चिल्ला के अपने नौकर को आवाज देना चाहा पर गले की खराश की वजह से कुछ बोल नहीं पाया। और पसलियों की दर्द ने मुझे कराहने पर मजबूर कर द</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>किसी तेज धमाके ने मुझे जगाया। मुझे तेज ठंड लग रही थी। आंखे कुछ देर तक बोझिल ही थीं। कमरे में बहुत थोड़ी रोशनी बची थी। शायद सुबह हो गई थी। मैंने जोर से चिल्ला के अपने नौकर को आवाज देना चाहा पर गले की खराश की वजह से कुछ बोल नहीं पाया। और पसलियों की दर्द ने मुझे कराहने पर मजबूर कर दिया।</p><p>सबसे ऊपर की मंजिल का मेरा वह छोटा सा कमरा आंगन की तरफ़ खुलता था। किसी तरह मैं बिस्तर से बाहर निकला और ख़ुद को लगभग घसीटते हुए आंगन की चाहरदीवारी पर ला पाया। नीचे समूचा आंगन तेज दियों की रोशनी से भरा हुआ था। ऐसे चमकीले दिए मैंने आज तक नहीं देखे थे। फिर ऊपर की ओर से आए एक तेज धमाके ने मुझे आसमान की ओर देखने पर विवश कर दिया।</p><p>एक तेज रोशनी आई और फिर मेरे देखते ही देखते वो अचानक बुझ गई। मैं थोड़ी देर सर और आंखों को मसलता हुआ सोचता रहा फिर मन ही मन बोल उठा, “<em>ओह! तो आज दीपावली है और मैं सोता ही रह गया। और अभी सुबह नही शाम का समय है।</em>“</p><p>दीवाली को कुलदेवता के मंदिर में दिए जलाने का काम मेरे हिस्से ही आता था। मंदिर घर के सामने ही पड़ता था। मैंने जल्दीबाज़ी दिखाई और सीढ़ियों की ओर बढ़ पड़ा, कम से कम आज के दिन मैं बाबूजी से डांट नहीं खाना चाहता था। सीढ़ियों से उतरते हुए मैने एक छोटे लड़के को अपने साथ ही, हाथ में दिए लिए उतरते देखा। मैं उसे नही जानता था। तीन मंजिले घर, जिसमे लगभग तीस सदस्य और कुछ नौकर, उनके बच्चे इत्यादि रहा करते थे उसमे इक्के दुक्के अनजान चेहरों का दिखना एक सामान्य बात थी।</p><p>भूदान में एक बड़े हिस्से के जाने के बावजूद हमारे परिवार के नाम क़रीब चार गांवों की संपत्ति अभी भी बची थी। सातवें दर्जे की पढ़ाई के बाद बाबूजी ने मुझे अपने भाइयों के पास कलकत्ते भेज दिया। कलकत्ते आते ही मैं बीमार पड़ गया। ज्वर उतरने का नाम ही नही ले रहा था। एक विलायती डॉक्टर ने मुझे गांव वापस लौटने की सलाह दी। मुझे अब भी याद है कि मुझे दुबला देख अम्मा रोयीं थीं और बाबूजी को यह सौगंध दिलाया था की मैं फिर कभी बाहर नहीं जाऊंगा। मैं न तो अपने बड़े भाइयों जितना पढ़ पाया और ना ही बाबूजी की नजरों में उनके जैसा सम्मान पा पाया। कारण यह कि मुझे गांव वालों को परेशान करने में बड़ा मजा आता था। आए दिन शिकायतों की वजह से बाबूजी मुझ पर जब भी गुस्सा होते,अम्मा बचा लेती थीं।</p><p>उस छोटे लड़के से बिना कुछ बात किए मैं नीचे आ गया। बरामदे में कई लोग एक बड़ी मेज के किनारे बैठे हुए थे। उनमें से मैं किसी को भी पहचान नहीं पाया। उनके सामने खाना परोसा जा रहा था। ऐसी मेजें और सूट बूट पहने ऐसे लोग मैंने कलकत्ते में ही देखे थे। कभी मैं आकर्षक लैंपो से सजी मेजों की ओर देख रहा था और कभी आसमान में जलती बुझती चिंगारियों को। बाबूजी, अम्मा और अपने परिवार वालों को ढूंढने की मंशा से मैं उनके सामने जा खड़ा हुआ। मैं काफ़ी देर तक वहां खड़ा रहा पर किसी ने मेरी ओर नहीं देखा।</p><p>थोड़ी देर बाद मुझे वही छोटा लड़का दिखा जिसे मैंने सीढ़ियों पर देखा था। वो काफी डरा हुआ लग रहा था। मैं उसके पीछे हो लिया। वह लड़का हाथ में दिया, एक बड़ा ही सुन्दर नक्काशीदार शीशा और खाने की एक थाली लिए कुलदेवता के मंदिर की ओर जाने लगा। मैं चिल्ला कर बहुत कुछ पूछना चाह रहा था, पर गले के दर्द ने मुझे फिर रोक लिया। मंदिर में उसने पहले सावधानी से खाने की थाली जमीन पर रखी, फिर मन ही मन कुछ बुदबुदाकर शीशा नीचे रख दिया। और वह वापस चला गया। दिए की वजह से मंदिर में थोड़ी रोशनी आ गई थी। मेरी दृष्टि बार- बार उस नक्काशीदार शीशे की ओर जा रही थी इसलिए उसके समीप जाकर अपनी परछाई बड़े ध्यान से देखने लगा। मेरी धड़कनें तेज हो गईं, पूरे बदन में एक बिजली की लहर सी कौंध गई। मुझे अपने गले पर ज़ख्म के निशान दिखाई दिए। नीचे देखा कि छाती के बाएं तरफ़ एक छुरा धंसा हुआ है। मैं रोने लगा। काफी देर रोने के बावजूद मेरे आंख सूखे रहे।</p><p>मैंने उस छुरे को निकालना भी चाहा पर मेरी उंगलियां उसे छू न सकीं। देर रात वही बैठ मैं आसमान की ओर देखता रहा। मेरी सांसे आश्चर्यजनक रूप से बंद थी। अभी तक मुझे ये समझ आ गया था की मैं इस दुनिया का हिस्सा नहीं हूं। फिर भी मैं घूम रहा था, एक परछाई की तरह।</p><p>(to be continued)</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#8 रणभेरी</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-8</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-8</guid>
      <pubDate>Mon, 05 Sep 2022 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>कविता</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>मन बल हो शिथिल
लगे मार्ग जटिल
कभी नीरस कोई लम्हा हो
मन चीख उठे &#x27;तुम तन्हा हो!&#x27;

ये चीख कभी रुकने न दो
पलकें अपनी झुकने न दो
हो अंधियारा कितना भी घना
तुम चिंगारी बुझने न दो

शिल्प तुम्हीं औजार तुम्हीं हो
ढाल स्वयं तलवार तुम्हीं हो
तुम रुद्र, तुम्हीं हो चिदानंद
नाव, लहर, पतवार तुम्</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>मन बल हो शिथिल<br>
लगे मार्ग जटिल<br>
कभी नीरस कोई लम्हा हो<br>
मन चीख उठे 'तुम तन्हा हो!'<br>
<br>
ये चीख कभी रुकने न दो<br>
पलकें अपनी झुकने न दो<br>
हो अंधियारा कितना भी घना<br>
तुम चिंगारी बुझने न दो<br>
<br>
शिल्प तुम्हीं औजार तुम्हीं हो<br>
ढाल स्वयं तलवार तुम्हीं हो<br>
तुम रुद्र, तुम्हीं हो चिदानंद<br>
नाव, लहर, पतवार तुम्हीं हो<br>
<br>
धरणी का प्रेम अगाध खिला<br>
नभ का आंचल निर्बाध मिला<br>
एकाकी का भान स्वपन<br>
जब कर्मक्षेत्र ब्रह्माण्ड मिला<br>
<br>
देव तुम्हें अवसर देंगे<br>
तुम देखो तो, हर क्षण देंगे<br>
कर मन अविचल, प्रयत्न कुशल<br>
विजय पताका लहरा दो<br>
अधरों पर तूफान धरे<br>
आज विश्व को बतला दो<br>
<br>
सच है मनुष्य संघर्षों में<br>
जीवन रचना के वर्षों में<br>
थोड़ा तटस्थ हो जाता है<br>
लेकिन सशक्त हो आता है<br>
<br>
मृत्यु पर जीत भले दुष्कर<br>
विषयों का नाश तो संभव है<br>
काम, क्रोध और मद आलस<br>
का कुछ विनाश तो संभव है<br>
<br>
विपदाओं का व्यूह भेद<br>
अब रणधीर बनो तुम<br>
ईश्वर आतुर खुश होने को<br>
यदि कर्मवीर बनो तुम</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#7 The King</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-7-the-king</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-7-the-king</guid>
      <pubDate>Thu, 30 Jun 2022 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>a short story</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>A small king with a small kingdom lived in a small castle. His opponents say there were no big threats yet he had a big sword and a big horse. The king often camped at night alone in the outskirts of his territory. Legend was that he used to kill giant monsters single-handedly wh</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p><em>A small king with a small kingdom lived in a small castle. His opponents say there were no big threats yet he had a big sword and a big horse. The king often camped at night alone in the outskirts of his territory. Legend was that he used to kill giant monsters single-handedly who used to eat their cattle and swamp their crops at night. But no one ever found the dead bodies of these monsters. According to the king, these monsters were magical therefore nothing remained after death. The king would come with the red-stained big sword in the mornings, his horse and clothes completely soaked in blood red.</em></p><p><em>His opponents spied on him one day and found something bizarre. The king would go to the outskirts and start slaying pokeweeds and wine berries with war cries like ‘HA-OOH!’. The legend was shattered in a moment when people got to know that their king was not killing giant monsters but small weeds. At last, his kingship could be saved with another legend, “The mighty king of the small kingdom protecting his subjects from toxic weeds”.</em></p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#6 आत्‍मावलोकन</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-6</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-6</guid>
      <pubDate>Sat, 07 May 2022 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>कविता</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>दिन के हिस्से जो रवि है
देवताओं की छवि है
काश ख़ुद का सूर्य होता
रजनी को उपहार देता..

&quot;हटा के बेड़ियां भीतर के मन की
करूं स्वीकार मैं आखेट वन की
तपाऊं अग्नि में जब देह अपना
किसी कोमल हृदय का भीत सपना

&quot;उछल के तोडूं मैं तारे गगन के
करे हुंकार भीषण, तब अधर ये
खींच कर धरती पर लाऊं,</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>दिन के हिस्से जो रवि है<br>
देवताओं की छवि है<br>
काश ख़ुद का सूर्य होता<br>
रजनी को उपहार देता..<br>
<br>
"हटा के बेड़ियां भीतर के मन की<br>
करूं स्वीकार मैं आखेट वन की<br>
तपाऊं अग्नि में जब देह अपना<br>
किसी कोमल हृदय का भीत सपना<br>
<br>
"उछल के तोडूं मैं तारे गगन के<br>
करे हुंकार भीषण, तब अधर ये<br>
खींच कर धरती पर लाऊं, <br>
रात में सूरज जगाऊं<br>
<br>
***<br>
<br>
किंतु संशय है सताता<br>
धैर्य मेरा कुछ गंवाता<br>
मेरी बढ़ती ख्वाहिशों पर<br>
एक अंकुश है लगाता।<br>
<br>
ये चाह कोई दंभ है या<br>
अभिमान का स्तंभ है?<br>
शक्ति से आसक्त क्या<br>
किसी भूल का आरंभ है?<br>
<br>
माना लिपटी स्याह रंग में<br>
किंतु शीतल स्नेह संग में<br>
दिन के हिस्से गर रवि हैं,<br>
रात के प्रीतम शशि हैं।<br>
<br>
पल में हरते प्राण तम के<br>
थोड़ा थोड़ा नित पिघल के<br>
प्रेम की भाषा यही है<br>
इसकी परिभाषा यही है।<br>
<br>
"धन्य है वो दिव्य शक्ति,<br>
रजनी को शशि से मिलाता।<br>
किंतु अपना ध्यान रे मन!<br>
तू है नभ में क्यूं लगाता?<br>
<br>
"मद में लिपटा तू विवश है<br>
पृथ्वी पर क्या तेरा वश है?<br>
व्यर्थ यह दु:स्वप्न, तोड़ो!<br>
आज ये अभिमान छोड़ो!<br>
<br>
"सत्य, अंधियारा है नभ में<br>
है अमावस रात काली<br>
क्या धरा तम से अछूती?<br>
बोल तेरे क्यूं हैं खाली?<br>
<br>
भूख, हिंसा, ज़र, गरीबी<br>
तम के गृहस्वामी जटिल हैं<br>
नित परस्पर भेद करते<br>
जग में कुछ प्राणी कुटिल हैं।<br>
<br>
"सुन! मनुज का वंश है तू<br>
जान! शिव का अंश है तू <br>
कर्म से बलवान बन और<br>
त्याग से धनवान बन तू।<br>
<br>
<br>
"कर्म का बस ये नियम है<br>
त्याग का बस ये धरम है<br>
है अचल यदि तू गरल में<br>
स्‍व न्यौछावर एक पल में<br>
तो ही शिव को पाएगा तू<br>
युगपुरुष कहलाएगा तू।<br>
<br>
***<br>
<br>
"वंचितों का ढाल बनके<br>
मैं नसों में अग्नि भर लूं<br>
मौन की आवाज़ बनके<br>
आज ही यह घोष कर दूं,<br>
<br>
"प्रण ये करना चाहता हूं<br>
सुधर्म धरना चाहता हूं<br>
सत्कर्म शोभित स्वर्णपथ पर<br>
अब पग मैं भरना चाहता हूं।"</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#5 श्री रामदरबार दृश्यावलोकन</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-5</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-5</guid>
      <pubDate>Sat, 16 Apr 2022 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>कविता</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>दृश्य बड़ा ही पावन है
ऋतुओं में जैसे सावन है
रामलला की झांकी ये
मनहर, सुरम्य, मनभावन है
अपने हिय को पल भर में चीर
श्री धाम दिखाते महावीर।

दरबार प्रकट, अद्भुत है धाम
आसन पर विराजें सियाराम
साकेतनगर सरयू के तीर
कर चंवर हिलाते महावीर।

प्रभु प्रेम सुधा सिरताज सजे
मद मान तजे औ&#x27; राम</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>दृश्य बड़ा ही पावन है<br>
ऋतुओं में जैसे सावन है<br>
रामलला की झांकी ये<br>
मनहर, सुरम्य, मनभावन है<br>
अपने हिय को पल भर में चीर<br>
श्री धाम दिखाते महावीर।<br>
<br>
दरबार प्रकट, अद्भुत है धाम<br>
आसन पर विराजें सियाराम<br>
साकेतनगर सरयू के तीर<br>
कर चंवर हिलाते महावीर।<br>
<br>
प्रभु प्रेम सुधा सिरताज सजे<br>
मद मान तजे औ' राम भजें,<br>
प्रभु आप कहें जिनकी गाथा<br>
धन्य धन्य वो महावीर।<br>
<br>
सांसों में बहे पावक प्रचंड<br>
मुख पर ओढ़ें मुस्कान मंद<br>
भक्तों में श्रेष्ठ, वीरों में वीर<br>
जय बजरंगी जय महावीर।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#4 शिव स्तुति</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-4</link>
      <guid isPermaLink="true">https://tusharpandey.in/posts/post-4</guid>
      <pubDate>Fri, 31 Dec 2021 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>कविता</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>जन्म लिया और जग देखा
कानों में जो ध्वनि पड़ी,
उसका सर्जक कौन था?
भव ऊर्जा का शक्ति स्त्रोत
पता नहीं क्यों मौन था?

माता को कुछ गाते देखा
किसी मंदिर, नित्य ही जाते देखा
भस्म समेटे, सर्प लपेटे
किसी शिला को फिर, नहलाते देखा

चंद्र सुसज्जित जिसके सर पे
उस छवि के पीछे कौन था?
भव ऊर्जा</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>जन्म लिया और जग देखा<br>
कानों में जो ध्वनि पड़ी,<br>
उसका सर्जक कौन था?<br>
भव ऊर्जा का शक्ति स्त्रोत<br>
पता नहीं क्यों मौन था?<br>
<br>
माता को कुछ गाते देखा<br>
किसी मंदिर, नित्य ही जाते देखा<br>
भस्म समेटे, सर्प लपेटे<br>
किसी शिला को फिर, नहलाते देखा<br>
<br>
चंद्र सुसज्जित जिसके सर पे<br>
उस छवि के पीछे कौन था?<br>
भव ऊर्जा का शक्ति स्त्रोत<br>
पता नहीं क्यों मौन था?<br>
<br>
अहम् कार त्यागा मैंने<br>
और छोड़ा अपना मद आलस<br>
उस शक्ति का फिर किया ध्यान<br>
चेतन मन से अपने भीतर<br>
<br>
वो निर्विकल्प, वो निराकार<br>
वह ओंकार आसित सबमें<br>
जिनको ढूंढा, हर जगह था मैंने<br>
व्याप्त हैं वो शिव, कण-कण में<br>
<br>
याद मुझे है, अब भी भगवन<br>
डमरू का वो प्रबल नाद<br>
नष्ट हुआ अज्ञान तिमिर<br>
अस्त हुए सब जर विषाद<br>
<br>
वसुधा के आंचल में टंकित<br>
अचल शैल, वो स्थिर महिधर<br>
आसन बना, हैं जिनपर बैठे<br>
चिर निद्रा में योगी शंकर<br>
<br>
कर्मयोग पुष्पित रहे<br>
हे विरुपाक्ष, हे वामदेव <br>
विनती केवल इतनी तुमसे<br>
हे उमापति, हे महादेव।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#3 मनीऑर्डर</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-3</link>
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      <pubDate>Fri, 23 Jul 2021 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>story</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>दस घंटे से ज्यादा का रेल का सफ़र थका देने वाला था।आंखें खुली तो पाया कि ट्रेन में शायद मैं अकेला ही था, सब उतर चुके थे। मुझे समझते देर नहीं लगी कि स्टेशन आ चुका था। आंखें मलते हुए मैने जोर से जंभाई ली और बैग का सारा भार कंधे पर डाल के बाहर निकल गया। बाहर घना अंधेरा था। रिक्शेवाले</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>दस घंटे से ज्यादा का रेल का सफ़र थका देने वाला था।आंखें खुली तो पाया कि ट्रेन में शायद मैं अकेला ही था, सब उतर चुके थे। मुझे समझते देर नहीं लगी कि स्टेशन आ चुका था। आंखें मलते हुए मैने जोर से जंभाई ली और बैग का सारा भार कंधे पर डाल के बाहर निकल गया। बाहर घना अंधेरा था। रिक्शेवाले बेतरतीब कतारों में सो रहे थे, उनमें से एक-दो ने पूछने की कोशिश की। मैंने विनम्रता से उन्हें मना किया। कमरा ज्यादा दूर नहीं था इसलिए पैदल ही चल पड़ा। कलकत्ते आए हुए मुझे कुछ ही महीने हुए थे। नौकरी के बाद पहली पोस्टिंग कलकत्ता मुख्य डाकघर में हुई थी। अनजान शहर में उतना मन नहीं लगता था सो जब भी छुट्टी मिलती गांव हो आता।</p><p>सड़क थोड़ी गीली थी, हवा भी सर्द थी। आसमान में अभी बादल थे। चारों तरफ़ एक अजीबोगरीब शांति थी। ऐसा लगता कि दुर्गापूजा के बाद शहर भी अलसाया हुआ था। कमरे पर पहुंचा तो ध्यान आया कि रुप्पन बाबू को फोन करना तो भूल ही गया। अब दरवाजा कौन खोलेगा! हल्की बूंदा बांदी भी शुरू हो गई थी। कई बार चिल्लाने पर जब कोई जवाब नहीं आया तो मैं दरवाजे से ही पीठ सटाकर बैठ गया।</p><p>आलोक! आलोक!</p><p>किसी ने धीरे से मेरा नाम पुकारा। उस आवाज को मैं पहचान नहीं पाया। रुप्पन बाबू के मकान के ठीक सामने सड़क के उस पार एक घर की खिड़की पर कुछ हलचल हुई, देखा तो कोई हाथ से बुलाने का इशारा कर रहा है। नजदीक जाकर देखा तो कोई अजनबी ही था। कोई पचास पचपन की उम्र रही होगी। सफ़ेद शर्ट के ऊपर काली कोट और काली पैंट पहने कोई सरकारी आदमी जान पड़ता था।</p><p>“रुप्पन बाबू सो गए होंगे। आप अंदर तशरीफ लाइए। सुबह होने में कुछ ही वक्त बचा है। मेहमानखाने में एक बेड भी है, आप अगर चाहें तो आराम भी फरमा सकते हैं।”</p><p>ऐसे मित्रवत व्यवहार का मैं आदि नही था, थोड़ी देर तो यही सोचता रहा कि आजकल कौन ऐसे अजनबियों की मदद करता है। ये आदमी कोई सिरफिरा तो नहीं। अपने घर इतनी रात कोट पैंट में कौन रहता है? मैंने सीधे पूछना ही सही समझा। जो जवाब आया उससे मुझे थोड़ी तसल्ली हुई और अपने नकारात्मकता पर तरस भी आया। वो रेलवे में टीसी थे और सुबह ही उन्हें ड्यूटी पर निकलना था। उनके चाय के ऑफर को बड़े बेमन से ठुकराया और वहा रखी एक पुरानी सी कुर्सी पर बैठ उनकी बात सुनने लगा। टीसी साहब के पास कई तरह के किस्से थे। बातों ही बातों में काफी समय बीत गया। टीसी साहब भी यहां अकेले ही रहते थे। उनका परिवार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसी गांव में रहता था। रिटायरमेंट को लेकर वो काफी उत्साहित थे। गांव जाकर रहना चाहते थे। थोपी हुई हंसी के पीछे छिपी उनकी गहरी उदासी भी कभी-कभी बाहर झांक ले रही थी।</p><p>बोलते ही बोलते वो अचानक चुप हो गए। कुर्सी से उठे और और अपने कलाई घड़ी की ओर देखा, एक गहरी सांस ली और थोड़े सकुचाते हुए कहा, “आपसे एक छोटी सी मदद चाहिए थी।”</p><p>मैंने तुरंत ही उनसे पूछा, “कहिए! क्या बात है?”</p><p>“एक मिनट” कहकर वो कुछ ढूंढने लगे।</p><p>कमरे के अंदर की चीजों पर मैने अभी तक कोई ध्यान नहीं दिया था, मेरी नज़रें सड़क के पार रुप्पन बाबू के उठने और दरवाजा खुलने का इंतजार कर रही थीं। टीसी साहब के कमरे के अंदर कोई बत्ती न देख मुझे शुरू में ही थोड़ा आश्चर्य हुआ था, सड़क पर जल रही सरकारी बल्ब की रोशनी खिड़की से छन कमरे में आ रही थी। पूरा कमरा गैरजरूरी चीजों से भरा हुआ था। दीवारों के प्लास्टर उखड़े पड़े थे। मकड़ी के जालों और गर्द से भरे हुए कमरे में उदासीनता अपना घर बनाए हुई थी। कुछ किताबें और अखबार फर्श पर पड़े हुए थे। ऐसा लग रहा था जैसे सालों से किसी ने कुछ भी छुआ न हो।</p><p>किसी पुराने संदूकची के बंद होने के आवाज से मेरा ध्यान उस तरफ गया। टीसी साहब ने रबर में बंधे नोटों का एक बंडल मेरे हाथ में पकड़ा दिया। इससे पहले कि मैं कुछ पूछता, एक हाथ से अपने कोट की जेब में शायद कुछ टटोलने लगे। फिर एक कागज का टुकड़ा भी मेरी ओर बढ़ाया। मुड़े कागज पर उर्दू में कुछ लिखा हुआ था, जो मेरे समझ से बिलकुल परे था। फिर हाथ जोड़कर बोले, “ये कुछ पैसे हैं, कागज़ पर मेरे खानदान का पता है। अगर आप इस पर मनीऑर्डर कर दें तो बहुत मेहरबानी होगी।” यह कहकर टीसी साहब ने एक बार फिर अपनी घड़ी की ओर देखा और अचानक अंदर किसी दूसरे कमरे में चले गए। मैं पूरे घटनाक्रम को समझने की कोशिश ही कर रहा था कि बाहर रुप्पन बाबू की किसी से फोन पर जोर से बात करने की आवाज सुनाई दी, वो जाग गए थे। मैं भी थोड़ी जल्दी में था, बैग उठाया, पैसे और पता जेब में रखा और बाहर निकल पड़ा। बाहर रुप्पन बाबू ने देखते ही कहा, “अरे! आप कब आए? उस कबाड़खाने में क्या कर रहे थे?”</p><p>“कुछ नहीं, ऐसे ही कुर्सी पर बैठ के आपके ही एक पड़ोसी से कुछ बात और आपके नींद से जागने का इंतजार कर रहा था।” बोलते-बोलते मुझे एहसास हुआ कि मैंने टीसी साहब का नाम तो पूछा ही नहीं। मैंने तय किया कि जब मनीऑर्डर की रसीद देने जाऊंगा तब उनसे नाम पूछ लूंगा।</p><p>रुप्पन बाबू कुछ पल चुप रहे फिर गंभीरता से बोले, “पर वहां तो कोई रहता ही नहीं।”</p><p>“आठ दस साल पहले एक रहीम चाचा रहते थे। रेलवे में टीसी थे। रिटायरमेंट के कुछ दिन पहले ही ड्यूटी के दौरान ही उन्हें हार्ट अटैक आया और चल बसे। सरकारी मकान है, पुराना है, तबसे आज तक उसमे कोई रहने नहीं आया।”</p><p>मैं भाग कर फिर से अंदर गया। वहां कोई नहीं मिला।</p><p>(समाप्त)</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#2 The Blood Ritual</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-2-the-blood-ritual</link>
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      <pubDate>Tue, 16 Jul 2019 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>a short story</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>Often, I would dream about riding a bicycle in my childhood days. However, the nature of the ride had a little adventure flavour in it. In a normal world, the bicycle rider has two main functions to do; keeping the handle balanced &amp;amp; empowering the paddles with feet.In my case</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>Often, I would dream about riding a bicycle in my childhood days. However, the nature of the ride had a little adventure flavour in it. In a normal world, the bicycle rider has two main functions to do; keeping the handle balanced &amp; empowering the paddles with feet.</p><p>In my case, I used to dream about flying the bicycle without putting any effort into the paddle. I would move the cycle around like a floating sci-fi vehicle. These dreams, with time, matured enough to make me believe that I, at some point in my childhood, actually rode a bicycle. The misconception continued.</p><p>Unavailability of any extra bicycle at home thwarted my riding fantasies in earlier days. When my grandfather retired from a forty-year teaching profession that event brought a great level of happiness to me. I got his bicycle. However, I got sad when I realised the truth. I COULDN’T RODE THE BICYCLE.</p><p>Keeping the importance of revision in mind, I started learning my forgotten art of man oeuvre.</p><p>The first step was to park or move the bicycle around without placing my foot in the air. After lots of frustration, I actually climbed the seat like a normal person with help from some self-appointed under-age trainers. My feet were away from the ground and the paddle was hardly accessible to me. With a little struggle I moved a few meters in a zigzag path. However, the incapacity to fuel the wheel resulted in a massive mockery of me. I collapsed with a bang.</p><p>Hiding the tears wasn’t easy for me, especially after rubbing my knee on the bare rocky road. I tore my cheek with my teeth to hold the pain which was quite successful.</p><p>In just a second, a band of brothers passed with school bags. Four students, older than me, were going to a middle school in the nearby village. One of them, the most volatile one, chuckled a little and examined my knee.</p><p>He had seen my continued failures; thus, he passed some sympathetic vibes. He quickly suggested a weird idea which needs to be discussed.</p><p>He told me that every bicycle needs some blood offering to be owned properly so I need to offer some if I was really serious in learning. I bought the idea but struggled to collect the blood because the wound was not very deep. However, I marked the bicycle handle with a very little amount of blood droplets which was available to me.</p><p>I couldn’t ride the bicycle properly for the next three to four months. I blamed myself, I would’ve offered some more blood not some droplets from a little tear of skin.</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>#1 The Scented Coupons</title>
      <link>https://tusharpandey.in/posts/post-1-the-scented-coupons</link>
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      <pubDate>Sat, 30 Mar 2019 00:00:00 +0530</pubDate>
      <category>a short story</category>
      <author>mailtusharpandey@zohomail.in (Tushar Pandey)</author>
      <description>It was a warm sunny day when the boy decided to go to the fair. The whole village was celebrating the auspicious Naga Panchami. It was a decades-long tradition, which continued despite numerous disasters and floods. The nearby river was the provider and the destroyer as well. It</description>
      <content:encoded><![CDATA[<p><strong>I</strong>t was a warm sunny day when the boy decided to go to the fair. The whole village was celebrating the auspicious Naga Panchami. It was a decades-long tradition, which continued despite numerous disasters and floods. The nearby river was the provider and the destroyer as well. It irrigated the livelihoods of farmers and peasants all year, and in the monsoons, devastated their houses. People would start making idols of Lord Hanuman with clay from the river nearly two weeks before the fair.</p><p>Children often discussed how they saw a black cobra drinking milk under the banyan tree. The banyan tree had its legacy. There was a saying in the commoners that the day the banyan tree will be washed away in flood, the village will be doomed.</p><p>The beautiful day started with a gentle slap on the cheeks of the boy when his grandmother tried to awake him from a sound sleep. His eyes sparkled as he was waiting for this day from forever. After completing the day-to-day chores, he started imagining how he will do a quick recce of the village fair and then start the adventures. The plan was to try the Ferris wheel first which will at least cost ten rupees.</p><p>Raising money was a cumbersome task. The boy had developed a special technique for a situation like this. He would hide his right hand behind his back raising the index finger above his head in a funny manner like a gully cricket umpire. Like an experienced batsman, the grandmother would understand the indication that the child is demanding one rupee coin. However, the fair was demanding twenty rupees in total. The boy quickly improvised the indication technique and made a zero with the left hand in the same manner. After a little struggle, need not be discussed, he succeeded in applying for twenty rupees.</p><p>The old lady smiled and asked, “what will you do with this much money”? “Sweets and stuff”, the boy replied. He knew he wasn’t going to receive any money if he tells the truth about the wheel. The lady opened a knot which was tied at the end of her cotton saree and ten rupees in total emerged in various denominations of one- and two-rupee coins, drawing a smile on the boy’s face.</p><p>He left home with the jingling sound of coins in his pocket.</p><p>Something was better than nothing. The expedition demanded more than this. There can’t be any retrenchments in the fun. Something was to be done. “How to get more money?” was the ultimate question.</p><p>On the way to the fair, there were two or three wooden shops selling tobacco, chocolates and a few other edibles. Shops were nearly empty. One or two younglings were purchasing some gum. Suddenly an idea emerged in the mind of the boy. Since many days, he has been noticing colourful sachets of candy-coated cardamom and aniseed.</p><p>“How much does it costs?” The boy asked a lean figure behind the counter pointing his finger towards the colourful strip. The shopkeeper was also a boy not older than him. He was wearing a red trouser with patches on it with a yellow shirt definitely shorter than his size. His mother had died not more than four months ago because of a deadly snake bite. The shop was the only provider of bread and butter to him and his handicapped father. The father was a country liquor brewer, always lying on a charpoy uttering godly words.</p><p>“One rupee for each sachet!”, the provider replied. “The sachet contains a printed text behind each wrapper. You can win another sachet or 1 rupee or the 5-rupee coin, which is the top prize.”</p><p>The investment started. The plan was to earn some more money to sponsor the fair adventure.</p><p>However, the first three bids were unsuccessful. With an optimistic mind, the boy purchased another sachet. Some passing children stopped to see the gamble. To his extreme surprise, he won a one-rupee coin, but the happiness was short because in two minutes he realized he had lost two bucks. The fragrance and sweetness in the mouth were keeping his mind calm, therefore, he decided to continue.</p><p>In short terms, a wise kid can say the gamble was a complete disaster, but if you ask an old person, the boy at least got enough sweets to fill his belly.</p><p>On the crossroad, he sighed seeing the Ferris wheel, as his pockets were empty, and dragged his feet towards home.</p><p>“How was the fair?” Did you eat something? I hope you enjoyed the wheel ride!”, the grandmother bombarded questions on him.</p><p>“Huh! It was okay.” the boy replied. “Why do you have a gloomy face? Was there any problem, Babu?”, the concerned lady asked.</p><p>“No! Actually, I’m tired of all the chaos. I bought four <em>Rasgullas</em>. They were very tasty. The height of the wheel was as much as the banyan tree. I was able to see across the river clearly.” the boy improvised twitching his lips.</p><p>After a few clock chimes, the lady had a gut feeling that something was wrong. He was only gone for 30 minutes. Also, he was smelling like scented spices. She made a quick calculation and found that four Rasgullas would cost twenty rupees at least. Undoubtedly, the boy was lying. He must’ve lost the money. Throughout the day, she tried to make him confess about it. But the boy was rigid. The day passed, and so did the fair.</p><p>After many years, that boy is now a young man. The kind lady is no more. The village no longer organizes the fair. The banyan tree is somewhere in the river after being washed away a few years ago. With the mercy of God, the village survived. The boy never told the truth to anyone. But one day the idea of writing struck his mind and you are reading it.</p><p>I am sure my grandmother is smiling from the stars above. I have a feeling that she already knew the truth. She was trying to let me fight my own battles of ethical and moral dilemmas.</p>]]></content:encoded>
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