#15 अलेक्जेंड्रिया
कविता
अलस-सुब्ह गिरती-रुकती दुविधापूर्ण बारिश ढीठ दिहाड़ी मजदूर गड्ढों से बचते भागते लोग उधर बेपरवाह थोड़ी मदमत्त सबको हिकारत से ताकती स्कूटर की मखमली सीट पर बैठी नाखून साफ करती अलेक्जेंड्रिया हरी कांच-सी आंखों से सपने देख रही... सूखी समतल दुनिया दिन में भी पूरा चांद निकलता हो जहां इक ऐसी दुनिया जिसमे सचमुच मिले उसे नौ जिंदगियां इंसान का नामोनिशान ना हों पसरे पड़े हों सिर्फ चूहे ही चूहे

