#17 खुशगवार शाम
कविता
उठती बैठती मूक सांसे। तेज गिरती बारिश से धुलकर, और चटख होती, इक धुंधली-सी याद! होठों के नीचे एक नन्हा सा तिल। उसकी डूबती नजरों में गोते खाता, दुनिया में, पर दुनिया से दूर, बेसुध,अनुरक्त और मदांध मैं। ढलती शाम। वापस लौटते पंछी। रेत की तरह फिसलता दिन। मेज पर चीखती किताबें। इक उलझी, अतृप्त, असहाय प्यास। मेज पर चीखती किताबें। बाहर बुलाते अमलतास के फूल। इन सबके बीच, स्वयं को भूल जाने की चाह। खुश, तटस्थ, बेपरवाह मैं!

