#22 अनायास (collection)
कविताओं पर कुछ प्रयोग (updated till 02/12/2025)
"तेरे वुस'अत-ए-करम के किस्से किससे कहें हम फिर इक बार पहली सी मुहब्बत किससे करें हम तेरे साथ, शहंशाह था मैं अपनी मुकद्दर का अब इन दुश्वार लम्हों की शिकायत किससे करें हम
"बीत गई वो रात कुछ और थी उनसे मिली सौगात कुछ और थी इश्क या क़फ़स के हिज्जे मुझे नहीं मालूम पर वो पहलू में थे तो बात कुछ और थी"
"ये हसीं वहम वो भी कही बेचैन होंगे चांद होगा फिर भी फीके नैन होंगे मेरा पागल दिल हमेशा सोचता था क्या करेगा जब ये उनसे दूर होगा दूर रहकर भी मुसलसल जी रहा है। "सोचता था वक्त कितना तंग होगा क्या करेगा जब ना कोई संग होगा भीड़ में किसको ये ढूंढेंगी निगाहें सूनी पड़ जाएंगी ये कमबख्त बाहें मेरा पागल दिल हमेशा सोचता था क्या करेगा जब कभी तन्हा पड़ेगा तन्हा होकर भी मुसलसल जी रहा है।
दफ्न है सैंकड़ों रुबा'इयाँ मुझमें छुप गईं इस भीड़ में तनहाइयां मुझमें लोग कहते हैं मैं झूठा हूं फरेबी हूं छू लिया क्या अपनी ही परछाइयां मुझमें चाहते हो फिर तराशूं नज़्म कोई बेरहम! क्या लूट लोगे जो बची अंगड़ाइयां मुझमें दिल्लगी है दिल्लगी को दिल्लगी का नाम दो मत करो रौशन चराग़-ए-आशनाईयां मुझमें
आज सुबह एक अजीब घटना हुई अचानक ये महसूस हुआ कि मैं बहुत खुश हूं सुख की तृष्णा पूरी हो गई थी अजीब इसलिए कि कोई वजह न थी फिर भी खुश था कभी तो मैं बहुत खुश होता हूं पर ना जाने क्या मायाजाल है लोगों को दुखी दिखता हूं मेरी तमाम दलीलें धरी रह जाती हैं जब लोग बोल उठते हैं नहीं! तुम्हें पता नहीं पर तुम दुखी हो सुख दुख के इस प्रपंच से दूर अब मैने इसका मूल्यांकन करना ही बंद कर दिया है और रुक गया हूं सुख दुख के रेखा पर हो शून्य या पूर्ण?
भूल गए जब एक दावानल ने तुम्हे आधा जला के छोड़ दिया था और तुमने कसम खाई थी की एक आग बचा के रखूंगा क्या दब गई वो क्रांति तुम्हारे मखमली बिस्तर तले क्या मांसल गंध में तुम्हारे नथुने गल गए हैं नशे में अक्सर अपनी मौजूदगी गुम हो जाती है और जब कभी भी ये उन्माद उतरता है घोर विरक्ति आती है छोड़ दो ये विकृत इच्छाएं जिनके पूरे होने के बाद भी तुम पूरे नहीं हो पाते कोशिश करो तुम्हारी कमियां गुजर जाएं तुम्हारे गुजरने से पहले।
People are wonderful, Incapable of not caring. Even if they mask, Even if they hide Behind empty faces. People are amazing, For they shine Even in the darkest hours, To assure others That all is not lost, That there is still hope. People are awesome, Because they dream, Because they try To make a better tomorrow, If not for the world, At least for themselves. People are great, For they make mistakes, For they learn, For they are Complete in their own existence
दिन गुजरते गए और कितने मौसम बीते पर जिस हृदय के तार तूने छेड़े थे वहां एक गीत धीमे सही पर अभी भी बज रहा है। जब भी तेरी गली से गुजरता हूं सांस टूटने लगती है सिर्फ ये सोच के कि अपने नए बगीचे में तू शायद मुझे भूल गया होगा स्मृतियों से मिट जाना बड़ी सजा है मृत्यदंड से भी कठोर।
अचानक ही धधक उठती है उनसे मिलने की ख्वाहिश पर ये दूरी और बेवफाई दिल को राख बना देती है कोई कहे कि उनकी आंखों में दिखता है एक कतरा भी सूनापन थोड़ा और जलके काजल ना बन जाऊं मैं
नयन कमल का पट खुला और कैसा ये आकाश दिखा थर थर्राते रजत मेघ पर, प्रक्षेपित स्वर्णिम पाश दिखा । उर्ध्वलोक में प्रतिक्षण होता, कैसा आज समर है? जलधर की प्रतिच्छाया में, तंद्रा लस दिनकर है । धरणी का हर श्वसन नाद, भव का प्राणाधार हुआ। शक्ति शून्य में स्थिर अविचल, अंतःकरण तुषार हुआ ।
आम के बगीचे से दूर, अकेले नीम के उस पार वो धुंए की चिमनी दिख रही है ? धरती पकती है वहां और बनते हैं महल । वो नीम कब अकेला था था बरगद का साया और शीशम से यारी आंवले की याद उसे अब भी आ जाती डाल पर बैठी कोयल की बोली कैसे उन पथिकों के दुखड़े भुलाती । उधर बायीं ओर खाली चाय के प्याले में छूटे हुए पत्तों से सूखे पड़े है कुएं में कुछ पत्थर, धरती और सिक्के, जो अब खोटे हो चुके हैं । "घर नहीं ये महल है" नित सुन इतराता वो रौबदार मूंछो वाला आदमी बोला, "काट दो वो नीम भी- अकेले खड़ा आंख में चुभता सा है"।
अध-जागी धरा के शिराओं में जीवन ने भी करवट ली वो शायद भूल गया आसमान में रात वाली बल्ब बंद करना रात का सोना पिघल लुढ़क रहा और जमने लगा सबमें सब तितर-बितर हुए ठीक वैसे, जैसे मधुमक्खियां भागती हैं आग की लपटों से वंदन कर, कर जोड़ हे मानस! सूरज निकल रहा है।
ऐसे ही एक दिन धूप में बैठे हुए याद आए तुम हल्की लकीर खिंच गई चेहरे पर हंसी की या शिकायत की पता नहीं तुझसे की गई हर बात गूंजती रही और खुरचती रही कलेजे को फिर याद आया क्या फर्क पड़ता है? ऐसे ही दबे पड़े हैं वक्त की गिरफ्त में अनगिनत रिश्ते जिनका कोई नाम नहीं समय की चादर ओढ़ गुम हो जाना ही बेहतर है ।
ख़ुद से कुछ अनधीन हुए सपने भी रंगीन हुए फागुन की थपकी से सारे शिकवे गिले ज़मीन हुए। उग आई रंगो की फ़सल कोई जमीं पर, और पकने लगी। किसी मधुबन से आती फिसलती, बहकती हवा भी महकने लगी। आओ थोड़े रंग खिलाएं संग जरा सा भंग मिलाएं रंगोत्सव के चिर उमंग में आज, अनंत तक नाचे गाएं।
"धीमे-धीमे सुलगने दो मगर आग न लगने दो "दिल अगर भींगता है, भींगने दो रंग चढ़ा? छूट जाएगा पर दाग न लगने दो देखो! आग न लगने दो "ये आशिक़ी बड़ी बेगैरत चीज है, बदनाम हो जाओगे!! फेर लो गर आंखें मिलें मरज-ए-इश्क न जगने दो सुनो! आग न लगने दो" *** "आग से डरोगे तो क्या ख़ाक इश्क करोगे? धीमे-धीमे सुलग के तिल-तिल मरोगे "रंग में रंगना किसी के कोई उक़ूबत नही दोस्त! निगाहें मिलेंगी तब जाकर समझोगे"
मुख पर आभा दीप्त, चढ्यो अति शुभ रंग चिर अनंत सुख काल रहे, हर क्षण रहे उमंग। धन धान्य पूरित रहे, कीर्ति बढ़े विशेष दीर्घायु हों नवयुगल, रक्षा करें महेश।
रूखी गरम हवाओं ने निचोड़ लिया है बादल सारा सूनी पड़ी हैं पहाड़ियां; उनके चूनर का रंग उतरने जो लगा है। समंदर की ओर एकटक ताकती, निहारती हुईं खड़ी हैं चुपचाप। लेकिन क्यों? क्योंकि भींगने से ज्यादा भींगने की आस भिंगोती है।
[कभी] मैं फिसलता बिखरता रेत की तरह वो समेटती, बांधती बिला शिकवा [कभी] एकसार होते हम दोनों वह इक मीठी प्यास खारा मैं [कभी] ईर्ष्यालु देवता न्यायाधीश लोग धधकते अंगारों की तरह टूटते बरसते [हमेशा] शीतल शाश्वत सरसता प्रेम
उबलते पानी की नाचती बूंदे आंच रोकते ही पड़ जाती हैं, समतल। जैसे दिल टूटने के बाद महसूस होती है एक गहरी रिक्तता, दिखता है सब सपाट और बेरंग। जैसे लंबे ज्वर से ठीक होकर हस्पताल से घर लौटते बच्चे को लगता है सबकुछ, शांत, गतिहीन, ठंडा। इतवार की अलसाई दुपहरियों में खाली सड़कें, जैसे दुनिया की सारी घड़ियां पड़ गईं हों बंद। इस बेरंग, सपाट, गतिहीन, ठंडी रिक्तता का नाम ही जीवन है। इसके अलावा सबकुछ इंसानी कारगुज़ारी है, शैतानी है, फांस है।
उस दिन मेट्रो की सीढ़ियों पर बैठे आखिर पूछ ही लिया था मुझसे, कि ये जो हममें तुममें था वो क्या था? होंठ फड़के थे, फिर एक लंबी खामोशी के बाद मैने ये सवाल तुम्हारी ओर ही मोड़ दिया था दोनों की ही आंखों में बाहर तेज गिर रही बारिश का प्रतिबिंब उतर आया था। जैसे छोड़ आया हूं जीना वही, जैसे मेरे प्राण अटक गए हों, उन सीढ़ियों पर। जब भी उनसे गुजरता हूं, टुकड़ा टुकड़ा घटता हूं अमावस की ओर।
हिमालय से आती सर्द हवा हजारों दरख़्तों से छन कर आती मुझे छलनी करने दौड़ती आती है और ये अदना अलाव मेरे सर्द रातों का इकलौता साथी अपनी पूरी अस्तित्व के साथ मेरी हिफाज़त करने को आतुर चट चट आवाज करता गीत भी गा रहा मेरे लिए।
हिमालय से आती सर्द हवा हजारों दरख़्तों से छन कर आती मुझे छलनी करने दौड़ती आती है और ये अदना अलाव मेरे सर्द रातों का इकलौता साथी अपनी पूरी अस्तित्व के साथ मेरी हिफाज़त करने को आतुर चट चट आवाज करता गीत भी गा रहा मेरे लिए।

