#30 सांख्य योग
कविता
जीत हार का दंश, नहीं विचलित करता जिस नर को, तन, मन, धन सर्वस्व होम कर, फिरता निर्भीक समर को। मिथ्याओं के बीच बात जो सत्य शील की करता है, षड्यंत्रों से मुक्त, जग में द्वेष नहीं करुणा भरता है। भूखण्ड जीत ले फ़िर भी जिसमें लेशमात्र का दर्प नहीं, क्षणभंगुर भव का भान जिसे, उठ जाए गिर के तुरत वहीं। विपदाओं के सन्मुख भी न हार जिस पौरुष ने मानी, अनुकूल प्रतिकूल सभी समतुल्य दिखे ऐसा ज्ञानी। जिसने छोड़ी नहीं तपस्या, बाधाओं से घबराकर, एक जन्म में जीता जो कल्पों का जीवन सागर। ऐसा वीर रणबांकुर जब संकल्प पर आकर अड़ता है, स्वयं, नियति को नतमस्तक होकर सब कुछ देना पड़ता है। नरता के दीपक की आभा, बढ़ती संघर्ष अपनाकर, जग रौशन करता अभीत, अपनी जान लगाकर। धर्मचक्र का रथ ऐसे सूरमाओं से ही चलता है, देव पूजते कोख जहां ऐसा अतुलनीय यश पलता है।

