#38 वापसी
संस्मरण
त्यौहारों के ख़त्म होते ही ऐसा लगता है मानो टीवी पर कार्टून देख रहे बच्चे को जबरदस्ती पढ़ने के लिए बिठा दिया गया हो। चंद घंटों पहले की चहल-पहल तुरंत शांत हो जाती है। मानो गहरी नींद से उठा कर तेज भागने को कह दिया जाए। पैर के साथ साथ शरीर भी शून्य पड़ जाता है। ये अनुभव जन्मजात है। अनगिनत बार स्फूर्त होता है। इसे विस्मय से ना देखा जाए। हजारों बार, जब वापस लौटना होता है, गांव से शहर, घर से स्कूल, मायके से ससुराल या फ़िर जब इस दुनिया से अलग।
एक खूबसूरत मेला, हजारों संगी साथी। हर कदम पर उल्लास, रंग और रस। ज्वार की तरह छलांग मारती जिंदगी। उफान की ओर सब अच्छा लगता है। जोर लगाते सब कुछ पा लेने की चाह, अतृप्त लालसाएं। पर जो चढ़ता है उसका उतरना भी तय है। ये सबको मालूम है। फिर ऐसा क्यों होता है कि इस सार्वभौम नियम को जानने के बाद भी मन उद्विग्न होने लगता, चिंतित होने लगता है। ये बिछड़ना, ये वापस लौटना इतना मुश्किल क्यों होता है, इसकी आदत क्यूं नहीं पड़ती।
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मेरा घर गांव के बिल्कुल आखिरी छोर पर है। उसके ठीक सामने एक घना, बलिष्ठ, पर निहायत ही खूबसूरत नीम का पेड़ है। आस-पास आंवला, अमरूद और नींबू जैसे छोटे पेड़ बेतरतीब कतारों में लगाए गए हैं या उग आए हैं। दाहिनी तरफ जो कुछ जगह बची है वहां लंबे बांसों का एक कुनबा रास्ता रोके खड़ा हैं। इनके जड़ से सर तक का विस्तार देख कर लगता है कि इनके पुरखे निश्चित ही कोई खूंखार दैत्य रहे होंगे जो शायद किसी श्राप से बांस बने खड़े हैं।
इन भूमिजातों की ही कृपा है कि हर घड़ी घर की छत पर खूबसूरत पंछियों का एक झुंड चहलकदमी करते मिलता है। ऐसा नहीं कि ये पंछी डरे या सहमे हुए हैं। इनकी गर्वीली चाल और मुखर चहक देख सुन ये लगता है कि इनके (माप के आधार पर) छोटे से दिमाग़ में मुमकिन है ये भाव बिंबित हो कि ये छत उनकी पुश्तैनी जायदाद है।
अभी कल ही चार कौओं और बिल्ली के एक बच्चे की तू-तू, मैं-मैं (या फिर कांव- कांव, म्याऊं-म्याऊं) देखने का दुर्लभ सौभाग्य प्राप्त हुआ। मुझे देख कौवे भाग गए। पर इसमें कोई संदेह नहीं कि बिल्लौटे को ये लगा होगा कि कौवे उससे डर के भागे हैं। बिल्लियां मुझे कभी पसंद नहीं थी। मैने हमेशा उन्हें संदेह की दृष्टि से देखा है। कभी सीढ़ियों पर या बड़े से घर के कोने में आमना सामना होता तो ऐसे मूर्तवत (stoned) होती जैसे दुनिया की साम्राज्ञी होने के साथ साथ उन्होंने अदृश्य होने का भ्रम भी पाल रखा हो। ऐसी पैनी नजर से देखती जैसे आत्मा ही टटोल रही हो। इनके शहरी रिश्तेदार थोड़े ज्यादा कुलीन हैं। गोरा रंग, और गाड़ियों, स्कूटरों पर बैठे दिन भर सोती रहती हैं। गांव की भूरी बिल्लियों जितना उन्हें संघर्ष नहीं करना पड़ता।
नीम के ऊपरी हिस्से में अंग्रेजी वर्णमाला के वाई के आकार की एक टहनी है जिसपर एक बड़ा लंगूर बैठा दिखता है। ये उस छोटे से लंगूरों के झुंड का मुखिया है जो गांव की छतों से होकर गुजरता है। रास्ते में बच्चे, बूढ़ों के हाथ जो भी खाने का दिख जाए ले जाता है। लंबी पूंछ और काले मुंह वाले ये बंदर काटते नहीं सिर्फ डरा धमका कर चीजें छीन लेते हैं। इनका मुखिया पूर्वजन्म का गांधीवादी लगता है।
मैंने ये चक्र बचपन से ही देखा है। गौरैया और कौओं का सुबह सुबह दाना चुगने पहुंच जाना, बिल्लियों से यदा कदा छोटी झड़पें, बंदरों का आना और उछल कूद मचाना। अब भी छुट्टियों में हर रोज़ मै ये रंग अपने भीतर समेटता हूं। घर छोड़ शहर लौटने के पहले की शाम मैं छत के हर एक कोने से सुदूर दिख रहे खेत खलिहान, पेड़ पौधे, घोंसलों से अनवरत गीत गा रहे पंछियों को अपने भीतर भर लेता हूं। शहर की भीड़ में ये मेरी अस्तित्व के खूबसूरत विस्तार बन मेरी हिफाजत करते हैं।
मम्मी की आँखें एक दिन पहले से ही नम होनी शुरू हो जाती हैं। मैने उन्हें नम ही देखा है। बहनें बताती हैं, मेरे घर छोड़ने से शहर पहुंचने तक वे जोरदार बरसती हैं।
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बीते साल नीम पर मिट्टी की एक सफेद मोटी परत चढ़ गई थी। उसकी निमौलियां ऊपर ही सूख जाती। मुझे याद है मेरे उपद्रवी मन ने इसके मृत्यु की खूब चिट्ठियां बाँची थी।
कल शाम इसे ध्यान से देखा तो ये पहले से और अधिक ज़ोरदार तरीके से झूमता और मुंह चिढ़ाता सा दिखा। पूरे बदन से मिट्टी गायब हो गई थी और उसकी जगह नए कोमल छालों ने ले ली थी।
“कितनी अच्छी बात है!और कितना खूबसूरत बदलाव है!”
घर से बिछड़ने की पिछली शाम हमेशा की तरह आसपास के दृश्य संजोते हुए मैं अपनी मूर्खता पर हंस पड़ा।
लौटना और भी ज्यादा खूबसूरत है, ये तो मेरी जड़ता है जो वापस लौटना नहीं चाहती। जीवन का असली मज़ा तो चलते रहने में है। जिंदगी जब उतर रही हो तब भी परेशान होना व्यर्थ है। यहां तक कि अर्थ-व्यर्थ का ये मोलभाव भी बेमानी है। जिदंगी है, हर तरीक़े के अनुभव होंगे। संभवतः असली सुख, मिलने बिछड़ने के परिकल्पना के बीच सपाट पड़े सन्नाटे में हैं।
सबका ईश्वर इसी सन्नाटे में हाथ थामने को तैयार बैठा है। और वो सारथी है गांव से शहर, घर से स्कूल, मायके से ससुराल या फ़िर इस दुनिया से दूर की यात्रा का। एक चक्र है जो घूमते रहता है, इस यात्रा में वापसी तय है, लौटना तय है। और ये भी संभव है कि जाने और वापस लौटने की अनुभूति महज़ एक दृश्य प्रपंच हो।

