#39 श्रृंगार
लघुकथा
राजधानी के गगनचुंबी स्वर्ण अट्टालिकाओं के बीच सूरज पूरी शक्ति के साथ चमक रहा था। पर उसकी रोशनी रनिवास तक पहुंचते पहुंचते धूमिल हो उठती थी। रनिवास क्षेत्र के मुख्य भवन में आकर्षण के लिए लगाए गए छोटे फव्वारे जिनमें घने कमलपुष्प खिले हुए थे, उन्हीं फव्वारों की एक ड्योढी पर एक हतभागी अपने श्यामल केश खोले बेसुध बैठी हुई थी। भूतल पर पड़े रत्नजड़ित आभूषण, नूपुर, करधनी, स्वर्ण मेखलाएं, इत्र, द्रव्य, सुगंधी और आज सुबह ही ले आए हुए पारिजात अब सूख आये थे। श्रृंगार के लिए लाए गए इन वस्तुओं पर उसकी जब भी नजर जाती, आंखों से जलधाराएं स्फूर्त हो उठती।
“महारानी! ये समय अश्रु बहाने का नहीं है। पाणिग्रहण का समय समीप आ रहा है। आप शीघ्र ही तैयार हो जाएं।” रनिवास की एक दासी बोल उठी।
मंजरी! अरी मंजरी! तू भी बड़ी निष्ठुर निकली रे! तुझे क्या ये स्मरण नहीं कि मेरा पाणिग्रहण हो चुका है। याद कर मैं इसी राज्य के एक राजकुमार संग ब्याही गई थी। ओ सखी! तुझे तो पिताश्री ने मेरे देखभाल के लिए संग भेजा था। राजसी चकाचौंध में तू क्या मर्यादाएं भी भूल बैठी?
हाय विधाता! तू कितना क्रूर हो सकता है ये मैंने आजतक कालिदास के काल्पनिक काव्यों में ही पढ़ा था। आज रात त्रियामा में ही मेरे इन हाथों ने अपने स्वामी का रक्त पोंछा है। और फिर इसी दिन मेरे इन रक्तरंजित हाथों पर मेहंदी लगाने का आदेश। मैं जब ब्याह के आई थी ये चन्द्र अभी किशोर था। पाटलिपुत्र के अनंत तक फैले राजस्तंभो में शिकार का खेल खेलने निकल पड़ता। तुझे भी याद होगा मंजरी! एक बार चंद्र के हाथों से भूलवश बाण राजनिवास में ठहरे किसी विदेशी दूत को जा लगा था। दूत को थोड़ी चोट आई थी, बाहों से रक्तस्राव हो रहा था। चंद्र मूर्छित हो गया था और मंजरी! तू ही उसे रनिवास ले आई थी। चार दिवस छुपा रहा था मेरे पास। राम के बार बार दिलासा दिलाने पर भी कि दूत स्वस्थ है, जीवित है, वो बाहर नहीं निकला। स्वयं मेरे दिवंगत श्वसुर परम भागवत समुद्रगुप्त उसे समझा बुझा कर वापस लेने आए थे।
सखी! मुझे सच बताओ क्या ये वही चन्द्र है। उदयगिरी का नीतिकार वीरसेन सच बोलता है कि राजदंड में विषधर छुपे रहते हैं। परंतु ये सत्ता लोलुपता क्या इतनी प्रबल होती है कि ये हलाहल, चन्द्र जैसे कोमल कुमार को स्वयं अपने भाई का हत्यारा बना दे।
मंजरी के साथ साथ मुख्य प्रचारिका रमा और मालती रनिवास में महारानी ध्रुवदेवी के करुण चीत्कार मूर्तवत खड़ी सुनती रहीं। सूरज की शक्ति कुछ और शिथिल हो चली थी। विधाता का ये क्रूर निर्णय सुन संभवतः वो भी निस्तेज हो कलिकाल के चक्र को देखने लगा।
उधर अंतरपुर में नगरवधु वसंतसेना की बाहपाश में पड़ा चन्द्र अपने हाथ खींचते, आमोद से चीख पड़ा, “अब बस करो बासंती! मुझे विवाह के लिए विलंब होगा।”
दूर नगर से भेरी वादकों के वाद्ययंत्रों की गूंज रुक रुककर रनिवास पहुंचती रही। नगरघोषकों का एक समूह कोने कोने में कुंतल राजकुमारी और पिछली ही रात अपने स्वामी रामगुप्त के हत्या से बेसुध महारानी ध्रुवस्वामिनी और चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के विवाह की उद्घोषणा करने में व्यस्त था।
महारानी अपने पैरों को लगभग घसीटते हुए मंजरी के पास पहुंची और टूटते स्वर में कहा, “इन रक्तरंजित हाथों को धो डाल मंजरी! यदि विष्णु यही चाहते हैं कि मैं चौसर के मोहरों की तरह एक राजपुरूष से दूसरे राजपुरूष के पास बदली जाती रहूं तो फिर यही ठीक। मालती को भेज कुछ नए हरसिंगार के पुष्प मंगा ले। मुझे श्रृंगार करना है।
(समाप्त)
पृष्ठभूमि : विशाखदत्त के नाटक देवीचंद्रगुप्तम के अनुसार, गुप्त सम्राट रामगुप्त ने अपनी पत्नी ध्रुवदेवी को शक शत्रु को सौंपने का निर्णय लिया। उनके भाई चंद्रगुप्त द्वितीय ने हस्तक्षेप किया, शत्रु को मारकर रामगुप्त को हटा दिया और ध्रुवदेवी से विवाह कर लिया।
कुछ इतिहासकार इस विवरण को संदेहास्पद मानते हैं और कहते हैं कि रामगुप्त चंद्रगुप्त की कूटनीति का शिकार हुआ। सत्यता के परीक्षण से इतर ध्रुवदेवी की मनोदशा का वर्णन करता लघुकथा के रूप में यह मेरा एक छोटा सा प्रयास था।

