#42 कीमियागिरी
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नियति को खूब खरी-खोटी सुनाने के बाद, वह थक के चुप हो गया। ईश्वर उसकी मूढ़ता पर हंसता हुआ, उसे टूटते हुए देखता रहा था। बड़बोला! उसके सैंकड़ों दावे कि अब जान ही लिया है सब कुछ। दहकती वासनाएं, अतृप्त लालसाएं खोखली करती रही उसे। ईश्वर अब भी चुप रहा। एक दिन अपने पाखण्ड का वजन लिए जोर से गिरा, धड़ाम! उसके टुकड़े ओछे थे। उसका अस्तित्व कृत्रिम था। भौचक, लज्जित, सिसकता हुआ, अपने अंत की गुहार लगाता रहा। ईश्वर अब हाजिर हुआ, निश्चल, निर्मल, चैतन्य हाथ खींचता हुआ अंक में भरता, पुचकारता तोड़ दिया संशय की गागरी। एक अद्भुत शिल्पकार! एक कुशल कीमियागर! शून्य शाश्वत अस्तित्व, शांत अराजकता, मौन भावहीन मुस्कान, हर एक स्पर्श, एक स्वाद। हर एक नज़र, शामिल हो होने का न्यौता। हर एक श्वास, चढ़ता उतरता समन्दर। हर एक विचार, एक अवसर। समूची सृष्टि का सामर्थ्य, उसके भीतर। पूरे जगत का प्रेम, उसके हृदय में। अब कुछ भी अप्राप्य नहीं था, जहां तक दृष्टि जाती सब उसका था, और वो, सबका।

