#43 अजीब दास्तां है ये
दास्तान
मौत का भी इलाज हो शायद ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं - फ़िराक़ गोरखपुरी
इस अजीब शहर में में एक निहायत ही सरकारी दफ्तर की कराहती व्यवस्था में मैं जब समाज सेवा का झूठा दर्प लिए अपने माथे का पसीना पोंछ रहा होता हूँ तभी गांव के एक भैया का फोन आता है कि भाई आईआरसीटीसी में लॉग इन नहीं हो रहा, हरिद्वार से दिल्ली का टिकट बुक करना है।
वहीं कल शाम से फ़ोन से दूर के भाई का व्हाट्सएप मैसेज पुकार रहा कि उनके प्रिंटर में लाल बत्ती जल रही और जल्द से जल्द समाधान ढूंढा जाए।
इस मोड़ पर यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि बाहर से लेकर निजी जिंदगी के पहाड़नुमा संघर्षों के बोझ तले दबता हुआ मैं न तो रेलवे के लिए काम करता हूं न हीं मैं कोई कंप्यूटर के मामलों का विशेषज्ञ हूं।
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एक समय जब मेरे सारे मित्र और परिवार के लोग, गुलाबी ठंड का बहुआयामी तरीकों से मजे लेते हुए भी कॉल पर सर्दियों की वजह से अपना परेशानियां गिनाते नहीं थकते जिससे कि मुझे अपने पसंदीदा मौसम खोने का ज्यादा ग़म न हो, ऐसे में मुंबई का कन्फ्यूज्ड मौसम मेरी दिमाग़ी हालत की रोज़ परीक्षा ले रहा है।
दो चार शामों से मन बहुत थका हुआ रहता है, ट्रेन की खिड़की से दिखते शाम के सूरज को धीरे धीरे क्षितिज पर पिघलते हुए देखकर भी अब दिल नहीं भरता। मुझे याद है विद्यार्थी जीवन में ऐसे पलों को देख मैं फूले नहीं समाता था। आजकल जैसे में मुझे सिर्फ तीन चीजें ही याद रह गईं हैं:- भूख, थकान और नींद।
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इन्हीं दिनों मेरा मन चलते-फिरते, उठते-जागते ये विश्लेषण करने में व्यस्त रहता है कि क्या मैं नितांत दुःखी हूं? पर इसे स्वीकारते ही वही मन मुझे बालकनी में दिन रात सोते हुए बिल्ली को छेड़ने के लिए प्रेरित करता है। अभी परसों की बात है, मुझे ऐसा लगा कि बिल्ली के सिर पर आहिस्ता हाथ फेरने से उसे अच्छा लगेगा। और एक सच ये भी है कि मैं दिन रात अकेले रहके इस अनजान शहर में स्पर्श कि परिभाषा लगभग भूल सा गया हूं , और इस खुराफात में मेरा अपना स्वार्थ छुपा है। खैर कुछ देर तक हाथ फेरने के बाद जब बिल्ली कुछ घबराई सी मेरी तरफ़ देखती है तब मेरे दिमाग में लाल बत्ती जल उठती है कि शायद इसे मेरा स्पर्श पसंद नहीं।
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मैने ये लगभग स्वीकार किया हुआ था कि मैं स्वार्थी व्यक्ति हूं। पर बहुत बाद में ये पता चला कि ये एकांत प्रेम मेरे अंदरूनी व्यक्तित्व का हिस्सा न होकर संभवतः परिस्थितियों द्वारा थोपी हुई थीं।
2021 के कोविड का समय था। दिल्ली में एकांतवास के समय कोरोना वायरस ने तय किया कि मैं अब अकेला नहीं रहूंगा। लक्षण बिल्कुल न के बराबर थे फिर भी अपनी नजरअंदाजी के कारण एक रात मैं चक्कर खा कर जमीन पर गिरा कुछ घंटों बेहोश रहा। आश्चर्य कि उस बेसुधी में मैं अपनी हालत पर मुस्कुरा रहा था, मेरी आंखों में आंसू थे, और मैने ईश्वर से ये प्रार्थना की कि मुझे कल का सूरज दिख जाए।
अगली सुबह जैसे मेरे लिए एक नई जिंदगी ले आई। पिछली रात के बाद जीवन और मृत्यु के लिए एक गहरा दर्शन उभर कर सामने आया। अब किसी भी चीज के लिए देरी नहीं करनी थी। अपने व्यक्तित्व के विपरीत जाकर, कॉन्टैक्ट लिस्ट के समूचे 21 लोग जिनमें 13 मेरे अपने परिवार वाले थे, सबसे खूब बात की।
लिखने की शुरुआत उसके बाद ही हुई। 2021 से पूर्व मैने सिर्फ दो कविताएं, एक दो अंगरेजी में कहानियां लिखी थी जो बेहद जटिल थीं।
उस मनहूस रात के बाद, मैंने लोगों से ज्यादा करीब आना, उन्हें सुनना शुरू किया। जब उनका साथ अच्छा लगता मै देरी नहीं करता और उन्हें बता देता कि मुझे वो पसंद हैं।
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पर इन दिनों बहुत ज़्यादा घुलना मिलना मुश्किल लगने लगा है। ऐसा लगता है बहुत ज्यादा हो गया। बहुत ज्यादा कह लिया, लिख दिया। हर एक दिन मेरे मन में ये सवाल उठता है कि ये कविताएं रच के, प्रेम गीत लिख कर मैं क्या पाना चाहता हूं। दुनिया से दूर भागने का मन होता है। पर सबसे दूर मैं खुश रहूं इसकी भी कोई गारंटी नहीं मिलती।
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सच ये भी है कि मुझे लोग अच्छे लगने लगे हैं, ये दुनिया बहुत प्यारी लगती है। सबके लिए उपयोगी होना, सबकी छोटी छोटी मदद करना, उन्हें ढेर सारा प्यार करना मुझे अच्छा लगता है। पर दूसरी तरफ़ जब यही चीजें मुझे मिलती हैं, यानी जब कोई मुझसे बहुत प्रेम करने लगे, परवाह करने लगे, तो एक अजीब विकर्षण उत्पन्न होता है। इस अरुचि के पीछे कई वजहें हो सकती हैं पर मुझे नजर नहीं आती। और न हीं मैं ये दंभ भर रहा कि एक सिद्धपुरूष की तरह मैने सबकुछ जान लिया है, स्वीकार कर लिया है। जिंदगी कभी कभार जंग सी लगने लगती है, और मुझे लड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं। मुझे किसी निर्णय पर भी नहीं पहुंचना। क्योंकि कभी कभी निर्णय पर पहुंचने की जल्दबाजी में व्यक्ति बेवजह बहुत परेशान हो उठता है। मैं एक मूकदर्शक कि तरह समय गुजरते देख रहा हूं। सब स्वीकार है मुझे।
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ये सब लिख ही रहा था कि बालकनी के फूलदानों के बीच संकरी सी जगह में सोती वह बिल्ली, कूदकर कमरे में घुस आई और बिल्कुल आहिस्ते मेरे पैर के दोनों अंगूठों पर बारी बारी अपना गर्दन रगड़ने लगी।
इंस्टमार्ट से छोटी छोटी चीजें मांगने वाला मैं निहायत ही आलसी आदमी, दौड़ कर अमूल की रबड़ी ले आया हूं। अपनी प्रकृति के अनुसार वो खाते हुए जैसे ये कह रही हो, kneel and serve me you human!, but don’t expect anything in return। और उसकी इस कृतघ्नता से मुझे कोई गुरेज नहीं।

