#44 पाप
संस्मरण
साल का ये वह दौर था जब सर्दियां एक हठीले माशूक़ की तरह छोड़ जाने को तैयार ही नहीं हो रही थी। ठंड के कपड़े सूरज के निकलते ही कांटो की तरह बदन को चुभने लगते थे।
फरवरी के उन आखिरी दिनों में कोहरे की चादरें दिन प्रतिदिन हल्की होने लगी थीं और उनके दूसरी तरफ क्षितिज से तेज आती चटख पीली रंगत सबको एकटक निहारने को मजबूर कर देती। ये सुंदर रंग गेहूं के फसल के साथ चहुंओर लगाए गए सरसों के पौधों की थी।
गांव की इकलौती सड़क जिसके किनारे घर बसे हुए थे वहां से थोड़ी दूर पूरब की तरफ़ इकलौता सूरजमुखी का खेत था जिसमें पौधे नैसर्गिक अनुशासन में सिर झुकाए शायद सूरज के उगने का इंतजार कर रहे थे।
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खेत नहीं गोया कोई क्लासरूम हो। समान दूरी पर लंबे खड़े ये आदमकद पौधे सूरज की पहले किरण के साथ ही तनकर खड़े हो जाते, और उसकी दिनमान गति की दिशा में ऐंठते रहते। पर ये बदलाव इतनी शांति से होता कि -- कोई जादुई तिलिस्म मालूम पड़ता था।
उस दौर में हम बच्चों ने कितनी ही बार सूरजमुखी की सरघुमाई देखने की योजनाएं बनाई थी पर इस बिल्कुल धीमे बदलाव के आगे हमारा धैर्य हमेशा दम तोड़ देता।
सूरजमुखी के खेत में उसके तेल भरे बीजों की खुश्क महक हवाओं में पसरी हुई होती। फूल के केंद्र में खूबसूरती से सैंकड़ों बीज टंके हुए दिखते थे। कभी कभी तो छूते हीं एक दो हाथ में गिर पड़ते।
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ये कितना अजीब है कि सुख की सारी व्यवस्थाओं के बीच रहकर भी आजकल सुबह जल्दी उठने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता है। पर मिलेनियम के बाद के उन शैशव वर्षों में, सुबह उठ कर बाहर भागने की न जाने कौन सी जल्दबाजी रहती थी। स्कूल जाने से पहले एक लंबा समय होता था जिसमें खेला जा सकता था, उछल कूद की जा सकती थी।
ऐसे ही एक दिन मैने अपने छोटे भाई को रसोईघर से दबे पांव निकलते देखा, तहकीकात की तो पैंट की जेब से हरे से लाल होती कुछ मिर्चियां निकली। गोल भरे-पूरे चेहरे में थोड़ी धंसी हुई उसकी शैतान आँखें उत्साह से चमक रही थीं।
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थोड़ी देर बाद सड़क पर बच्चों के तेज शोरगुल की आवाजें सुनाई देने के बाद, छत की मुंडेर से देखा तो मेरा छोटा भाई अपने छाती से कुछ दबाए घर की ओर तेजी से दौड़ा चला आ रहा था। उसके पीछे दर्जनों बच्चे धमाचौकड़ी करते सरपट भागे आते आ रहे थे।
जाकर देखा तो इन हज़रत के हाथ में एक पंछी दिखाई पड़ा। इनकी लहूलुहान उंगलियां एक विचित्र संघर्ष की गाथा बयां कर रहीं थीं। इनके हाथ में एक हल्के हरे रंग का तोता दबा पड़ा था।
सूरजमुखी के खेत में बीज खाने अक्सर आते हुए सुग्गों को लाल मिर्च से ललचाने और पकड़ लाने की इनकी योजना आखिरकार सफल हो गई थी।
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परिवार में सभी बड़ों को तोते को पालतू बनाने से समस्या थी। मुझे व्यक्तिगत तौर पर कोई दिक्कत नहीं थी क्योंकि मैं ग्यारह बरस का ही था लेकिन चूंकि मैं बड़ा भाई था, इसलिए खुद को शायद बड़ा साबित करने के लिए उसे समझाने लगा कि इस तोते को छोड़ दो।
सबके बार बार बहलाने फुसलाने के बावजूद वह तोते को छोड़ने के लिए राज़ी नहीं हुआ।
एक बुजुर्ग इस घटना को बड़े आनन्द के साथ काफ़ी देर से देख रहे थे। मुस्कुराते हुए चलकर आए और तपाक से चौंकते हुए बोल पड़े, “देखो इसकी चोंच पीली है” “इसका मतलब हो सकता है ये तोता नहीं तोती हो। क्योंकि नर तोते की चोंच तो लाल होती है।
हम सब बच्चे ये नया नाम सुन कर एक दूसरे का मुंह देखने लगे और फुसफुसाने लगे, “तोती!”
“हां! तोती। ये पंछी नर नहीं मादा है। और इसके छोटे छोटे बच्चे भी होंगे। अगर इसे कैद रखोगे तो बहुत पाप लगेगा।”
पाप की बात सुनकर सबने भयभीत चेहरे लिए मेरे भाई की ओर देखा। अभी थोड़ी ही देर पहले पालतू तोता रखने की ज़िद करता हुआ वो खूब रोया था। लेकिन अगले ही पल पाप के डर से वह पंछी को छोड़ने के लिए राज़ी भी हो गया।
छोड़े जाने के बाद नीचे लगभग लुढ़कते हुए तोते ने पहले तो उड़ने के लिए थोड़ी कश्मकश की फ़िर कुछ प्रयासों के बाद उड़ने में सफल रहा।
सूरजमुखी के खेत की ओर उड़ते हुए जा रहे उस तोते ने भी शायद चैन की सांस ली होगी। सूरज अब पूरी तरह निकल आया था। तेज कौंधती रोशनी में तोते की चोंच सुर्ख लाल नज़र आ रही थी।
(समाप्त)

