#51 प्रेम सुधा साँचा रस है
कविता
स्वार्थ, द्वेष की फांस लिए, सब का, अपना ढेरा है। चाहे बंधु, सखा, कुल छूटे, कहते, ये मेरा, वो तेरा है! फिर शुष्क पड़े कुछ आंखों के, आतप जलते हतभागों के, हित कौन भला अम्बर होगा? क्या उनका भी ईश्वर होगा? क्या प्रेम, दया, करुणा, दुलार, ऐसों के हिस्से आयेगा? सूने बंजर पाषाणों पर, उपवन भला क्या खिल पाएगा? अब भी समय ठहर जा प्यारे! सुन अतीत क्या कहता है, लोभ-हवस से जन्मा वैभव, निश्चित है! मिटता, ढहता है। एक प्राण है, एक धरा है, जीवन उत्सव ख़ूब भरा है, चहुंओर दिखे जो, वह तुम ही हो, तुमसे पृथक, कुछ नहीं खड़ा है। द्वेष अग्नि, है लोभ रोग, और स्वार्थ मृत्यु की छाया है। बंधु, सखा, अपनों से फेर मुख, भला सुखी कोई रह पाया है। धन, पद, मोह, दरप त्यागो तुम, प्रेमी अँखियन गर जागो तुम, भगवन् भी तत्क्षण मिल जाएंगे, अंक खोल यदि मांगो तुम। शाश्वत शब्द तुषार के, करुणा का स्वाद अनूठा है। प्रेम सुधा साँचा रस है, बाकी सब कुछ झूठा है।

