#53 आरोहण
अनूदित कविता
नरम रेशमी धूप से अलसायी, उस, दोपहर, तुम्हारा आना... जैसे किसी अल्हड़, मचलती पहाड़ी नदी की कोई चंचल धारा; कर गई थी मुझे मुकम्मल सराबोर। सुर्ख लाल लिबास में, तुम्हारा गरिमामय अंदाज़; मासूम मुस्कान और उन नशीली आँखों की कारगुज़ारी, कि हवा में तैरने लगा था कोई सुरीला राग। उस मोहिनी सूरत का आहिस्ता खिलना, कि बेबस कमल भी ईर्ष्या कर उठें; गुलाबी पंखुड़ी से उन लबों के पीछे मोतियों सी वह दंतुरित मुस्कान, कि बड़े-बड़े ग़ालिब भी रह जाएं अंगुश्त-ब-दंदाँ। तुम्हारा मुख़्तसर सा आना, खुशियाँ उगा गया है मेरे रोम-रोम में; तुम लौट आओ, नूर-ए-हयात! कभी न कभी, कहीं न कहीं। अब बरस भी जाओ उमड़-घुमड़ कर, मुझ प्यासी मरुभूमि पर।
This is a translated version of the original poem by Ashok Chowkulkar ji which can be read here.


श्रृंगार रस में डूबी अद्भुत रचना
बहुत सुंदरता से आपने अनुवादित किया, तुषार। मज़ा आया।