#55 यहां हर फ़ूल ब्यूटीफुल
लेख
पारिजात जब स्वर्ग से जमीन पर उतरा, तब उसे यहां हरसिंगार कहा गया। उसकी श्वेत, बेहद कोमल पंखुड़ियों को देखकर कभी नहीं लगता कि उसे धरती के लिए बनाया गया है। छोटी नारंगी डंठलों में ज़रूर कोई भयंकर जादूगरी की गई है, क्योंकि बिल्कुल छोटे नगों में सैंकड़ों इत्रों के बराबर ख़ुशबू का होना कोई आम बात नहीं।
कहते हैं स्वर्ग में इसके आश्रय में तो सदा उत्सव रहता था। वहाँ इसके नीचे गन्धर्व गीतों का गान करते थे। उर्वशी, हेमा और सहजन्या जैसी अप्सराएँ इसकी छांव में अपने नृत्य व गीतकला का प्रदर्शन करती थीं। सुबह औंधे मुंह गिरे पड़े हरसिंगार के फूलों को देख मन पसीज जाता है। इन बेचारों को दिन की पहली किरणों का अनुग्रह भी नहीं मिल पाता है। रात में खिलना और सुबह होते होते क्षीण हो जाना इनकी नियति है। पता नहीं ऐसा होना कोई लौकिक दंडविधान है या इन संन्यासियों के स्वयं का अनुशासित वीतराग। इतने ओजस्वी और सुगंधित होने के बावजूद इनकी ये विनम्रता और निरहंकार बहुत कुछ सिखा जाती है। शायद इसीलिए ये नन्हें फ़ूल इतने कोमल और हल्के हैं कि बस छुओ और ये पिघल जाएं।
गुड़हल, हरसिंगार, चम्पा और यहां तक कि सदाबहार और कनैल के फूलों को भले ही दैवीय पूजन का विशेष सौभाग्य प्राप्त है पर साहित्यिक गलियारों ने गुलाब को जो इज्जत दी है वो अद्वितीय है। शायरों को तो जैसे गुलाब के अलावा कुछ सूझता ही नहीं। शतपत्री, कार्णिका और चारुकेशर जैसे खूबसूरत नामों से पुकारा जाने वाला गुलाब थोड़े दंभ से तो जरूर भर जाता होगा। आशिकों को गुलाब के फूल ले जाते हुए देखा है? मानो कलेजा ही निकाल ले जा रहे हों। जब तक महबूबा के हाथों सुपुर्द ना कर दें, उनका राजसूय यज्ञ संपन्न नहीं होता। फेंके हुए गुलाबों को देख, बहुत कुछ अंदाजा लगाया जा सकता है। अगर तर-ओ-ताज़ा गुलाब फेंका गया हो तो समझो किसी के प्रेम का साहिल लबों तक आकर वापस लौट गया है। अगर सूखे गुलाब फेंके हुए मिलें तो शायद किसी ने आगे बढ़ना सीख लिया है। और अगर कुचले मसले गुलाब पड़े मिलें तो बिना कुछ अंदाजा लगाए वहां से भाग लेने में ही भलाई है।
गुलाब का यूं आंशिक स्वीकार किया जाना कचोट भी जाता होगा उसे। सोचता होगा, मेरी पंखुड़ियों में तो तुम्हे अपनी प्रेयसी के लब दिख जाते हैं, मेरे कांटो का क्या!
मैने पहली बार जब गुलाब के पौधे को देखा था तो इसके कांटे मुझे बहुत दिलचस्प लगे थे। खूबसूरती में बराबर दर्जे के, भले ही थोड़े अलग रंग के, जैसे ये उगते नहीं, देर रात कोई टांक जाता हो आड़े तिरछे। कोई जादुई तिलिस्म मालूम पड़ता है। चंदामामा, चम्पक की कहानियों में कोई दुष्ट जादूगर राजकुमारी को जादू से फ़ूल बना देता था, ठीक वैसा ही इंद्रजाल। क्या पता जिस दिन कांटो को फूल के बराबर की नज़र मिले और मुट्ठियां भींच उसे संपूर्णता से स्वीकार किया जाए, उस दिन किसी की रिहाई भी हो जाए।
आम प्रचलन के विपरीत जाकर कवि श्री निराला ने गुलाब को पूंजीवादी और शोषक के रूप में अंकित किया है। उनकी एक कविता में कुकुरमुत्ता, जो आम आदमी का प्रतीक है, गुलाब से कहता है— "खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट, डाल पर इतराता है केपीटलिस्ट!"। अब कुकुरमुत्ते में खूबसूरती ढूंढने का कृत्रिम दुस्साहस मैं नहीं कर सकता। पर फूलों की दुनिया में सामंतवाद का अगर कोई कठोर प्रतिद्वंदी है तो वो है — गेंदा का फूल।
हर जगह आसानी से मिल सकने वाला, प्यारा, खूबसूरत पर सस्ता, एक तरह से समाजवाद का द्योतक — अपना प्यारा गेंदा का फूल। कोमलता के पैमाने पर देखें तो इनका भी कोई जवाब नहीं। मुझे इनकी घनी पंखुड़ियाँ इतनी मुलायम मालूम पड़ती हैं कि मन होता है कि इनका बिस्तर बनाओ और लेट जाओ। इनकी नरमी ही इन्हें सबके हृदयों तक पहुंचाती है - फूलमाला बनकर। मुझे याद है बचपन में इन फूलों की पंखुड़ियां उतारो तो डंठल के ऊपरी हिस्से पर हल्के सफेद रंग का कुछ होता था जिसे हम बच्चे मजे से खा जाते थे। और इनके अनेकों रंग रूप। गहरे पीले रंग से लेकर रक्ताभ लाल रंग तक के प्रतिरूप। नन्हे पौधों पर फूलों का झूमता वज़न, जैसे नृत्य का आयोजन हो। थोड़ी देर गौर से निहारो तो मन भी झूमने लगता है।
जहां ऐसी सुंदरता है वहां उसके चाहने वाले भी हैं। चाह और अनुराग कभी कभी इस स्तर पर पहुंच जाता है कि लोभ से सदाचरण भी डांवाडोल हो बैठे। नवरात्रि या किन्हीं विशेष त्योहारों के रोज अल-सुबह फ़ूल तोड़ने की ऐसी भागम भाग होती है कि कभी कभार कलियों को भी असमय न्यौछावर होना पड़ता है। खाली लौटने वाला हर एक शख़्स फ़ूल के पौधे लगाने का प्रण लिए लौटता है। एक बार बचपन में मेरी छोटी बहनें रोते बिलखते मेरे पास आईं, पड़ोस के किसी बच्चे ने उनका लगाया फ़ूल उखाड़ फेंका था। और सिर्फ़ फेंका होता तो शायद बच जाता। अपने घर के सामने, जिसे हमारे यहां की बोली में दुआर कहते हैं, लगा भी आया। खूब हंगामा हुआ था। उसकी दादी "अरे वो एक बच्चा है" कहती रहीं। मेरा मन तो उसे पीटने का हुआ था। पता चला हमारी दोनों शाहजादियों ने गेंदा फूल के अपने खूबसूरत पौधों की इतनी तारीफ़ कर दी थी कि सामने अकेला खड़ा बच्चा कुढ़न से जल गया था। खैर, शाम तक ये बच्चा पार्टी एक साथ खेलते कूदते पाई गई थी।
आज का दौर सूरजमुखी के फूलों का है। आखिरी बार जब सामने देखा था तो बड़े बड़े मोटे तेल की बीजों सहित देखा था। तेल भी इतना कड़वा की माई (दादी) नीम के पत्ते डाल इनकी कड़वाहट निकालती थीं। पर हां, इसके फूल बहुत सुंदर दिखते हैं, चमकते पीले पंखुड़ियों के बीच खूबसूरत ख़ाके में पड़े बीज, जैसे हाथ जुड़ाए केंद्र की ओर खड़े हों। पर फूल के तौर पर इसकी सामाजिक स्वीकृति मुझे पूंजीवादियों की साजिश लगती है। क्योंकि अगर खूबसूरती ही एक पैमाना है तो फिर जलकुंभी के फूलों की क्या गलती! हल्के बैंगनी और गुलाबी पंखुड़ियों पर हल्दी के रंग का जरा सा टीका लिए इनके रूप रंग का भी तो कोई जवाब नहीं।
पलाश के तोते की चोंच जैसे दिखने वाले गहरे नारंगी-लाल फूल, सेमल के बड़े मांसल लाल फूल, अशोक के छोटे पर घने गुच्छेदार और गुलमोहर के पतले चमकीले लाल फूलों को अभिजात्य वर्ग की श्रेणी में रखा जा सकता है। क्योंकि मजाल है कि कोई साधारण व्यक्ति इनकी कलियां तोड़ ले। आंधी तूफानों में भी अडिग खड़े इन लंबे वृक्षों के फूलों की ओट से आसमान पर बनती चित्रकारी सबका मन मोह लेती है।
फूलों की गाथा में जिन फूलों को मैं सबसे ऊपर का दर्जा देना चाहूंगा तो वे हैं — बनफूल। बीहड़ों में, जंगलों में और ताल तलैयों के किनारे दुर्लभ स्थितियों के बावजूद, खिल जाने की विचित्र जिजीविषा। फिर भी इनके भाग्य में ना तो ईश्वर के चरणों में पड़ना लिखा है, ना ही किसी रूपसी के श्यामल बालों में गूंथा जाना। घासों, कांटो और झाड़ियों से ताकते झांकते कुछ नन्हे, कुछ गहरे रंग के ये प्यारे बनफूल हमें सिखाते हैं कि आडंबरहीन और साधारण जीवन का अपना अलग सौंदर्य है।
मुझे महुए के फूल भी खूब पसंद है। पता नहीं महुआ को फ़ूल की श्रेणी में रखना न्यायोचित होगा भी नहीं। कभी इसके वृक्ष के नीचे से गुजरो तो लगता है इसकी मादक सुगंध से अभी नींद आ जाएगी।
आज सुबह शर्ट की जेब से कनैल के दो सूखे फूल निकल आए। बचपन में जब हॉस्टल के लिए निकलना होता था, तो मम्मी पूजाघर से एक फूल लाकर ऊपर की जेब में रख देती थीं। साल बीते, उम्र बढ़ी। अब यात्रा के लिए निकलते समय खुद ही एक फूल रख लेता हूं। एक फूल मम्मी भी ले आती हैं, कितना भी कहो कि रख लिया है, ले ही आती हैं। दरवाजे तक आता हूं तो दहलीज के किनारे दादाजी की लाई हुई पानी की बाल्टी दिखती है, जिसमें कभी गुड़हल तो कभी कनैल के फूल तैरते मिलते हैं। इन प्रथाओं के पीछे की वजह तो मुझे नहीं मालूम। पर इतना जरूर मालूम है कि मेरे कुशल-क्षेम में नन्हें फूलों का बहुत योगदान है।
(समाप्त)









