#56 डाह
लघुकथा
सुदर्शन के खलिहान में ट्रैक्टर से अभी अभी उतारी हुई गेहूं की फसल से एक पहाड़नुमा आकृति बन गई थी। सर के ऊपर तेज खड़े चैत के सूरज के तले रखे गेहूं के दाने ऐसे चमकते जैसे स्वर्ण आभूषणों की ढेर सी लगी हो। तेज धूप से कुलबुलाए कीड़े पतंगे गेहूं की परतों से निकल कर छांव की ओर सरकने लगे थे। जो भी रास्ते से गुजरता, तारीफ़ करता हुआ दिखता कि वाह! सुदर्शन के तो भाग खुल गए। गांव में सबसे अच्छी फसल निकली है। ऐसे में इस भय से कि कहीं इस भाग्योदय को जाने अनजाने किसी की नज़र ना लग जाए, सुदर्शन की पत्नी एक काली हांडी उस पर रख गई। उसने मन ही मन सोचा कि इस बार तो वो ग़िलट बाजार से नए झुमके बनवा के ही मानेगी।
उधर बिरजू की छुटकी बेटी ने पड़ोसी के यहां नई फ़सल उतरी हुई देखी तो दौड़ के अपनी अम्मा को बताने गई। अम्मा! शकुंतला चाची के यहां गेहूं गिरा है, इतने मोटे मोटे दाने जैसे मकई हों। सुबह के बर्तन मांजना छोड़ बिरजू की मेहरारू दनदनाते बाहर चली आई। चमकती हुई फसल देख जैसे सन्निपात हो गया हो, सारा काम छोड़, वापस कमरे में जाकर लोट गई।
सांझ को बिरजू गांव खलिहान से वापस घर लौटा। बरामदे में बैठते ही लुंगी में दबी बीड़ी के पैकेट से एक बीड़ी निकाली। बीड़ी सुलगाते उसे जोर की खांसी आई। उसने पानी के लिए अपनी मेहरारू को आवाज दी। थोड़ी देर बाद एक लड़की आंखों में एक गूढ़ मुस्कान लिए हाथ में पानी से भरा लोटा गिराते छलकाते ले आई। यह बिरजू की छोटी बेटी राधा थी।
"अम्मा नहीं दिखाई दे रहीं तुम्हारी!"
"चार घंटे से सो रही है, अम्मा" यह कहकर वो अंदर चली गई। पीछे पीछे बिरजू भी हाल खबर लेने कमरे में दाखिल हुआ। आँखें खोले दरवाजे की ओर ही बिना किसी भाव भंगिमा के अपनी पैनी नजर से देखती हुई पत्नी दिखाई पड़ी। तपाक से बोल उठी, "तुम बस बीड़ी सुलगाते रहना। बाहर देखा है, शकुंतला दीदी के यहां कितनी ज्यादा फ़सल निकली है। पिछले साल हमारे धान के खेत से ट्रैक्टर निकाल ले गया था। कम से कम दु बोरा धान निकलता कुचले हुए फसल से। तुम शिकायत लेके पहुंचे थे तो क्या हुआ था याद है ना!"
सुनते ही बिरजू सोच में डूब गया। उसे याद आया कि कैसे सुदर्शन ने पूरे गांव के सामने ये बोलकर उसका मज़ाक उड़ाया था कि बिरजुआ बहुत बख़ील आदमी है। डींगे बहुत बड़ी बड़ी हांकता है पर मजाल है कि गांव के जग प्रयोजन में एक पैसा भी चंदा दिया हो। सुदर्शन की बेटी जो राधा के साथ ही पढ़ती थी, उसने भी क्लास में कह दिया था कि पापा बता रहे थे कि बिरजू काका के यहां से दुर्गापूजा में चंदा नहीं मिला और हमारे यहां से तो पूरे इक्यावन रुपया गए हैं इस बार। बिरजू को याद आया कि जब राधा ने उससे इसके बारे में पूछा था तो वो कैसे शरम से सिहर उठा था।
सुदर्शन भैया ऐसा करेंगे उसने ऐसा सपने में भी सोचा था। बाबूजी जब मरणासन्न हुए, भैया को मेरा खयाल रखने को समझा गए थे। बोल गए थे कि थोड़ा तेज दिमाग़ का है। बाल बच्चेदार हो जाए तो शायद कुछ अकल आए। अब तुम दोनों ही एक दूसरे के सब कुछ हो।
अपने ख़ून को नीचा दिखाने से क्या मिलता है उन्हें। दुत्कार, हीनता और कटाक्ष के अलावा क्या दिया है उन्होंने। बिरजू ये सोच सोच कुढ़ता रहा।
अंधेरा छाने लगा था। बिरजू कमरे में कुर्सी पर बैठे बैठे जमीन की ओर नजरें धंसाए हुए था। वही कमरे में निढाल पड़ी राधा की मां ईर्ष्या से तपती और बड़बड़ाती रही।
बिरजू के सर में जैसे ज्वर चढ़ा। चेहरे की आकृतियां बदलने लगीं। आंखों का खून तेजी से दौड़ने लगा था। बिरजू अनायास उठा और खाली पैर ही खेतों की ओर भागने लगा। डगमगाते, पथरीली डगर की परवाह किए बिना वह चलता गया।
***
थोड़ी देर बाद आसमान में तेज रोशनी फैली। लोगों के चीखने चिल्लाने की आवाजें भी आईं। कुत्ते, सियार चिग्घाड़ मार वातावरण में मनहूसियत भरे जा रहे थे। चेहरे पर कालिख लिए बिरजू भी अपने पैरों को घसीटते हुए घर तक आ ही पहुंचा था।
उस दोपहर ईर्ष्या की चिंगारी जो राधा की अम्मा में फूट उठी थी, शाम तक बिरजू से तेज होती हुई, रात में लहलहाते नाचते गेहूं के खेतों तक जा पहुंची थी। उस रात वास्तव में कौन जल था था इसका आंकलन करना मुश्किल है। दहलीज पर आमने सामने खड़े, डाह और ईर्ष्या के अंगारे में राख हुए बिरजू और उसकी पत्नी एक दूसरे से नजरें भी नहीं मिला पा रहे थे। फ़सल का क्या है वो अगले साल फिर उग आने वाली थी।
(समाप्त)



