#29 सावन
न महुए छुए
ना आंख लगाई
जोगी-सा किसी वट के नीचे
कभी ना हमने, धूनी रमाई
द्वंद्वों में पलते जीवन को
रहती है आस कहां बूंदों की?
आंखों का रंग गिर जाता है
कंटक पथ के बाशिंदों की
स्मृतियों को तह में, फिर
आज कौन ये रंगता है
मौसम की बदली सूरत
कोई प्रपंच लगता है
हरियाली की चादर पनपी
हिय हर्षाता बादल उमड़ा
झूम उठा सावन सुंदर
दृश्य बड़ा मनभावन निखरा
बूंद-बूंद से निर्मल करता
प्राण सहित पूरे तन को
सावन है या इंद्रजाल
जो उन्मत कर दे कण-कण को
प्रेम सुधा की बारिश
कब तक रोक सकेगा जिद्दी मन
गीत, प्रीत का रचते बुनते
चमकेगा होकर और सघन ☘️

