#33 पूजन
प्रेमिकाएं अभिनत थीं
उन्होंने उन्मुक्त कंठ से
स्तुति की, गीत गाए
उनके स्वामित्व और अपेक्षाओं
ने चीख चीखकर
रिक्त विज्ञप्त किया।
जब भी गईं
तोड़ गईं।
नायिकाएं कठोर थीं
उनका दर्पण सिर्फ उनकी
ओर ही खुलता था।
स्वयं को निहारते, इठलाते
झांक लेती थी कभी कभार मेरी ओर
कनखियों से।
सौंदर्य बल से
उन्होंने उपासना मांगी,
चाही एक मधु लिप्त दासता।
कुछ लड़कियां ऐसी थीं
जिनके स्नेह और समर्पण ने
ख़ूब संजोया, संवारा।
प्रीत की लहलहाती फ़सल
देख ख़ुद खिलखिलाईं, चहकीं
पर बदले में कुछ नहीं मांगा
फिर अनायास
समाज के एक इशारे पर
कुव्यवस्थाओं के घनघोर
अंधेरे में ओझल हो गईं।
फिर कुछ ऐसी भी थीं
जिन्होंने स्तुति तो की,
पर आंखों में आंखे डाल
उपासना भी मांगी।
कुव्यवस्थाओं को ठुकरा
उड़ती रहीं स्वच्छंद,
उनके प्रेम ने मुझे सशक्त किया
और वे स्वयं भी निखरी हो दिव्य।
ऐसी देवियों, स्वामिनियों की प्रशंसा में
मैंने गीत रचे, कविताएं गढ़ी
अविरत।

