#45 कीमत
इस दुनिया में लाखों दिमाग़ है,
हजारों मुंह है, सैकड़ों कलम है,
जो निरंतर सोचते, बोलते और
चीखते रहते हैं।
कितना भी मोम डाल लूं कानों में,
पुतलियों पर कालिख पोत लूं,
मैं फ़िर भी देख सुन लेता हूं —
बहुत सारा।
बेरोक टोक, घुसे चले आते हुए,
ये हठीले कबीले, और उनके विचार
चबाते जाते हैं मेरी हस्ती,
मुझे एकरंगा बनाने का स्वप्न लिए।
किंकर्तव्यविमूढ़ मैं,
हर क्षण रिहाई के लिए लड़ता हुआ,
अक्सर मजबूर नज़र आता हूं।
आज़ाद होने की जितनी ज़्यादा कोशिश करता हूं
उतना ज्यादा बिखरता जाता हूं।
इन तमाम संघर्षों के बावजूद
मुझे भीड़ का होना नहीं पसंद।
ख़ुद के खुद का बने रहने के लिए
चुकाई जाती हर एक कीमत—
मंजूर है।

