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Tushar Pandey
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#14 आगे बढ़ता जाऊंगा

कविता

कोई शक्ति है या छाया है
तू है यथार्थ या माया है
बतला दे मुझको हाल अभी
बन बरस न जाऊं काल अभी

देखा है मैंने, दबे पांव
तू तर्क भेष में आता है
तपोमूर्त साधक मन में
तू माहुर घोले जाता है

"होगा तू भक्षक सपनों का
चल किए हैं तूने कर्म ध्वस्त
पर मेरे निश्चय के दृढ़ शिखरों
से कभी ना होगा सूर्य अस्त

तेरे कुतर्क को हो तत्पर
मैं तत्क्षण आग लगाऊंगा
सांसों में भरकर ओमकार
मैं आगे बढ़ते जाऊंगा

रुक जाना मेरी चाह नहीं
संकट आए अब आह नहीं
अब बजरंगी-सा हो अभीत
मैं संशय लंका ढाऊंगा
और आगे बढ़ता जाऊंगा।"
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