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Tushar Pandey
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#31 इसक

कविता

मैं इधर देखूं या उधर देखूं
वो ही नज़र आए जिधर देखूं
इसक की रंग का गहरा असर है
न कोई ग़म, न कोई फ़िकर है

ज़माना सुर्ख आंखे लाल लेकर
कंटीले कायदों की ढाल लेकर
भले चाहे मिटाना प्रेम मेरा
पर इस रात का होगा सवेरा

संवर महबूब के साए-शजर में
गहरी नीली आंखों के सफ़र में
पुरानी सूनी शाखें खिल गई है
ये रंगीन बारिश कुछ नई है

बरसती चांदनी मुझपर ऐसी निखरी
जंजीरे फ़लसफों की टूटी-बिखरी
बर्ग-ओ-गुल लबों पर पिघल रहा हूं
मैं कतरा-कतरा उसमें ढल रहा हूं।
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