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Tushar Pandey
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#46 अधूरा लिखूंगा

मुक्तक

लिखने चलूं गर तुम्हारा ये चेहरा
पहले कहूंगा कि सुंदर है चेहरा
फ़िर थोड़ी और कोशिश करूं
तो लिखूंगा कि कैसे तुम्हारी एक नज़र 
मुझे छू जाती है—ऐसे
जैसे किसी नज़र ने न छुआ हो अब तक 

इतना बोल शायद मै थोड़ी देर चुप बैठूं 
ये सोचते कि कहीं कुछ ज़्यादा न कह दिया हो
कहीं मेरी ही नज़र न लग जाए मेरी खुशियों पर
फिर एक टक निहारते—मन में
बसी तुम्हारी तस्वीर टटोलूंगा आदतन, 
और गर मिल गई नज़रें तो 
ठिठककर आँखें मूंद लूंगा

सोचूंगा कि क्या इस बार भी मेरा प्रेम 
अधूरा रह जाएगा हर बार की तरह
क्या दम तोड़ देगा—आंसू बनकर
जिनकी तीखी बारिशों से 
लकीरें बन आईं हैं मेरे चेहरे पर
मुस्कुराऊं तो छिप जाती जो

***

फिर शायद लिखूं मैं एक सुंदर कहानी
छोटा था बच्चा, और बूढ़ी थी नानी
धमाचौकड़ी करती हुईं सैंकड़ों स्मृतियां
लड़ उठेंगी पसरने के लिए पन्नों पर

कहानी में जीऊंगा एक बार फ़िर —खुद को 
इतवार की दुपहरी चुप चुपके खिड़की से
शक्तिमान देखता, मेरा मन भी उड़ जाएगा 
थोड़ी देर 
फिर नॉस्टेलजिया के वज़न से गिर जाऊंगा
धड़ाम — खुशियों के साथ खुद से बिछड़ने का
ग़म भी आ बैठता है कल्पनाओं पर, अमूमन

***

धूल झाड़ मै जिद्दी कलम का सिपाही
अब थोड़ी और चौड़ी मुस्कान लिए
शायद लिखूं पर्वत, नदियां
उपवन, सूरज, ईश्वर, पंछी, हवाएं
थोड़ी और कोशिश करूं तो शायद
बखान कर दूं — 
परमात्मा  देख लेने का अनुभव भी
ऐसा अनोखा अनुभव 
कि आह भर उठें कितने सारे।

***
इतना कुछ कहने, लिखने बोलने के
बावजूद बच जाएगा, बहुत सारा
जो कहना चाहूंगा वो अनकहा रह जाएगा
भटकते रहूंगा— इर्द गिर्द

मैं, एक अधूरा रचनाकार
सीमित अस्तित्व लिए
हाय!
कैसे समेटूंगा ये असीम विस्तार 
असल नहीं लिख पाऊंगा मैं
जाहिर है—
सिर्फ परछाई ही लिख पाऊंगा।
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