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Literary Works
कविता

#52 तुम लौट आओ

April 26, 2026

चैत की इस प्रखर दुपहरी में
न जाने क्यों
धरती का कलेजा
धधक उठा है;
आग की लपटें
हवाओं के कंधों पर सवार,
अट्टहास कर रही हैं
सबकुछ भस्म कर देने को।

डर है... ये निष्ठुर लपटें
कहीं तुम्हारी स्मृतियों के
कोमल शिलालेख न पिघला दें,
और छोड़ जाएं
मेरे अंतर्मन को एक बंजर मरुस्थल।

तुम लौट आओ,
बनकर तुषार की एक ठंडी रात,
और इतना बरसो
कि यादों पर बर्फीली परतें
सदा को जम जाएं।
अब लौट आओ...
इन झुलसती तनहाइयों से
अब डर लगने लगा है।

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