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Literary Works
कविता

#19 आंचल

May 11, 2025

धूप या बेमौसम बारिश थी शायद
या फिर ऐसे ही आंचल में
जा छिपा था वो...

हल्के रेशमी धागों का वो अंबर 
सैकड़ों चांद दिखते थे जहां से
खिलखिलाता
मखमली थपकियों के बीच 
सो गया था।

छोटी गुलाबी हथेली के कपाट
में अपनी तर्जनी को क़ैद छोड़े
समूचा संसार ही दे रखा हो जैसे
मुस्कुराती मां, एकटक निहारती 
जागती रही।
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