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Literary Works
कविता

#20 रंग बेरंग सब एक

June 20, 2025

भाग्य तेरा था किसी वनिता के
बालों में गूंथा जाना
या ईश्वर के श्री चरणों में
पड़ न्यौछावर हो जाना

तू बड़भागा रे ओ गुलाब!
जो उसके हिस्से आ पाया
फीके रंगों में भी देखा
उसने अपना ही तो साया

इक तितली बेरंग
कहां तक रंग किसी को दे पाती 
अलग थलग ही रही जिंदगी
नहीं रहा कोई साथी

एक रात सबसे छुपकर
मधु तलाशने आई थी
सूखे पड़े थे तुम साथ में
कलियां भी मुरझाई थीं

कुछ कौंधा था उर में उसके
सुध-बुध खो बैठी जो सारी
तेरा अंत स्वीकार ना उसको
संकट था ये भारी 

बेरंग पंखों पर समेट कर
ओस की बूंदे ले आई
तितली का ये प्रेम देख
नभ की आँखें भी भर आईं

शशि-यामिनी चुप-चाप देखते
मन ही मन मुसकाते थे
रंग बेरंग सब एकरंग हुए
तितली-गुलाब सुख पाते थे।
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