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Literary Works
आशु कविता

#21 ढलती शाम

June 20, 2025

ढलती शाम 
मेरी रेलगाड़ी
किसी छोटे शहर से गुजरी
सब घर जा रहे थे
लोग बाजारों से,
बच्चे ट्यूशन से,
चिड़ियां एक गीत गाते
अपने घोंसले की ओर चल पड़ी थीं।

मैं सयाना
कुछ तलाशते
घर से दूर, बहुत दूर आ गया था।

इस बड़े शहर में,
दिन खत्म होता है अब मेरे लिए
शामें नहीं ढलती

हां! सूरज जरूर डूबता है.
और डूबने लगता है, एक बच्चे का मन
जो गांव की धूल में खेल कर थका हरा
हर इक ढलती शाम घर लौट आता था।
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