दुनियावी ढोल मंजीरों के बीच, ओझल होतीं मेरी रवहीन सांसे। उचकता, उछलता और नाचता मैं — बेसुरा, एक अदना आदम। गीत बुनने की ईप्सा में, थकता-बुझता, कई जन्मों से षड्यंत्र रचता, मैं अब चीख उठूंगा सप्तक स्वर में, तमाम हदों से ऊपर। पंछियों से कह दो, चुप सो जाएं, और नदियां सिल लें अपने होंठ, शुरू हो रहा — विप्लव गान। इंसानी बा-इख़्तियार मालपुओं की चुभती मिठास। इनसे पेट तो भर जाता, पर जी नहीं भरता। क्षितिज से दौड़ती आती, ये सौंधी हवा, धौंकती मेरी जठराग्नि; कहीं वो डूबता सूरज निगल न जाऊं, फ़िर चांद मिठाई काट खाऊं — कुतर-कुतर।
#49 ईप्सा
विप्लव गान