#54 खूबसूरत मोड़
साहिर का खूबसूरत मोड़, शायद उतना भी खूबसूरत नहीं।
दोपहर बेवक्त नींद टूटती है और मैं बिस्तर पर औंधे लेटे हुए, बगल की दीवार पर नजरें धंसाए, खुद को खोया हुआ पाता हूं। ये किसका घर है, मैं यहां कैसे आया, इन तमाम सवालों के बीच एक तेज सिहरन मेरे रीढ़ में कौंध जाती है। बदन बेजान है, और सांसे रुक सी गई है, सुनाई पड़ता है तो केवल दिल का आहिस्ते धड़कना। मेरी चेतना छत की दीवार को भेदते हुए आसमान तक जा पहुंची है।
ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं और आगे-पीछे, सिर्फ़ मैं — अकेला। पृथक होने का एक अजीब एहसास, इतनी ज्यादा स्वतंत्रता, इसका क्या करूं मैं! उत्सव मनाऊं, या दुःख, इसका निर्णय करना बेहद मुश्किल है।
ये एकाकीपन आजन्म है; शिशु के रूप में मां को पुकारता था, और मां दौड़ी चली आती थी। निश्छल वात्सल्य। मेरे निरर्थक शोर और बोलने की कोशिशों के बीच उसका खिलखिलाता, हंसता, और हौसलाफजाई करता चेहरा। और मुझे लगता था जैसे मैं समूची सृष्टि का बल झोंक दूं, इतनी करतबें दिखाऊं कि वो चेहरा मेरे ऊपर ऐसे ही छांव की तरह बना रहे। पर मां के दूर जाने पर ऐसा खालीपन भर आता था जैसे किसी परित्यक्त कमरे में सन्नाटा।
इस भीड़ भरी दुनिया में व्यक्ति कितना अकेला है, उसे कितना भी मां का आंचल मिले, पिता का स्नेह मिले, दोस्तों का साथ मिले या प्रेमिकाओं का आलिंगन, भीतर कुछ न कुछ शेष रह ही जाता है। और अगर ये संगी साथी भी दूर हों, तब तो जैसे धमनियां भी शुष्क होने लगती हैं, अकेलापन, आंखों का रंग निचोड़-सा लेता है। सबसे ज्यादा तकलीफदेह होता है — स्पर्श की परिभाषा भूलते जाना।
मैं खूब लिखता हूं, इस विक्षोभ की गहरी खाई में अक्षर, शब्द और खूबसूरत पंक्तियां ठूंस-ठूंस कर भरता हूं। कुछ राहत मिलती है, पर अधूरी सी। शिव दिखे थे मुझे कुछ बरस पहले; विशालकाय चैतन्य, महसूस किया था ध्यान में, रोंगटे खड़े हुए थे, आंखों से अश्रु धारा बही थी, गला भर आया था, मुझे लगा अब भर गया है खालीपन, मैने मान लिया कि अब तो पूर्ण हो गया हूं। उद्घोषणा कर दी थी, अब तो संन्यास ही बचता है, अब मैं ईश्वर का हो गया हूं। मां बहुत परेशान हुईं थीं, भय छुपाते हुए (जो मुझसे नहीं छुप पाया था) फिर वहीं खिलखिलाता, हंसता, और हौसलाफजाई करता चेहरा, जैसे मेरी कोई झूठी बाल लीला हो।
फिर जीवन में प्रेम ने दस्तक थी। नियति ने भी क्या खूब खेल खेला! कुछ से ख़ूब स्नेह मिला, कभी नपा तुला, कभी कसैला, दूरियां अपेक्षित थी, वे चली भी गईं। प्यार के लिए ठहरना पड़ता है, दृढ़मूल लिए। सरकती, भागती हुई नौकाओं पर कौन चढ़ना चाहता है भला! दूरियां स्वीकार करनी पड़ीं मुझे। दिल न टूटने का ग़म ज्यादा दुश्वार था। सोचता रहा, कितने खुशनसीब होते है वो लोग जिनका प्यार मुकम्मल होता है। साहिर का खूबसूरत मोड़, शायद उतना भी खूबसूरत नहीं।
जब तक होश रहता, मेरी समझदारी बड़ी सुगमता से मेरे कान में कहती - दूरियां यथार्थ है, इनसे क्यूं लड़ना? पर कुछ दिनों समझदारी थक कर सो जाती है, और एकाकीपन का भान लिए, सिहरनें हिसाब लेने दौड़ाती हैं, तब मुझे कोई आश्रय नहीं मिलता, औंधे बिस्तर पर जम जाता हूं, सामने की दीवार भी सपाट मुंह लिए ये तमाशा देखती है।
एकाकीपन एक कठोर सत्य है, यथार्थ की भी अपनी शर्तें हैं। भागती हुई नौका लिए, मैं एक शहर से दूसरे शहर भटक रहा हूं। इश्क़, प्यार और मुहब्बत कागज़ी फूल बन कर रह गईं हैं। परिवार और मित्र पीछे छूटते जा रहे। रिश्तों का मुकम्मल होना — एक बेहद अननुमेय घटना बन कर रह गई है। अगर अपने साथ हों, तो हर एक दिन त्यौहार है। अकेले, पकवान भी फीके लगते हैं। इसलिए कभी ईश्वर से जुड़कर पूर्ण होता हूं, तो कभी साथियों के संग, और लिखना भी तो इसी पूर्ण होने की बुभुक्षा मात्र है, मन शांत हो तो भला कौन लिखता है!
खैर यह यक़ीन भी है कि मेरे साथ ऐसा कुछ भी नहीं होगा जो सृष्टि के विधान के अनुरूप न हो। सांस का क्या है, वो तो लौट ही आएगी।


जब ऐसा कुछ लिखा जाता है जिसे वाकई महसूस किया गया हो तो पढ़ने वाले को समझने में ज़रा भी तकलीफ नही होती भले हर पहलू पाठक के अनुभव का भाग न भी रहा हो। सबसे ज़्यादा वो पंक्तियां जिनमें लिखा है कि समझदारी थक कर सो जाती है और एकाकीपन का भान लिए सिहरनें हिसाब लेने दौड़ती हैं और दीवार बस तमाशे को देखते रहता है, बहुत ज़्यादा अच्छे से लिखा हुआ है। पढ़कर अच्छा लगा।
लेख की तारीफ़ की जाये या आपकी marketing strategy की 😀