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जब ऐसा कुछ लिखा जाता है जिसे वाकई महसूस किया गया हो तो पढ़ने वाले को समझने में ज़रा भी तकलीफ नही होती भले हर पहलू पाठक के अनुभव का भाग न भी रहा हो। सबसे ज़्यादा वो पंक्तियां जिनमें लिखा है कि समझदारी थक कर सो जाती है और एकाकीपन का भान लिए सिहरनें हिसाब लेने दौड़ती हैं और दीवार बस तमाशे को देखते रहता है, बहुत ज़्यादा अच्छे से लिखा हुआ है। पढ़कर अच्छा लगा।

Pratiksha Yadav's avatar

लेख की तारीफ़ की जाये या आपकी marketing strategy की 😀

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